परिवर्तन ---- आलोक कुमार सातपुते


रिटायर्ड मास्टर तिवारीजी बड़ी ही बेचैनी से चहलकदमी कर रहे थे। अपने ललाट पर उभर आई पसीने की बूँदांे को वे बार-बार अपनी धोती से पोंछते। एक अजीब सी असुरक्षा की भावना घर कर गई थी उनमें। तीन
लडकियाँ थीं उनकी। बड़की और मँझली की शादी करने में वे लगभग बिक ही चुके थे, अब तीसरी सर पर सवार थी। वे छुटकी के भविष्य के प्रति आशंकित थे। इसी चिन्ता में उन्हें रात भर नींद न आती। सोते समय ऐसे करवटें बदलते, मानांे बिस्तर में काँटे उग आये हों। मँझली बेटी के दहेज़ लोभी ससुराल वालों ने उसे जलाकर मार डाला था। कुछ समाजसेवी संगठन और पत्रकार वग़ैरह कुछ दिनों तक थोथी सहानुभूति
दिखाते रहे, और उसके बाद अब हम क्या कर सकते हैं, हमें जितना करना था, कर चुके आदि जुमले
बोलने लगे। तिवारीजी सोचने लगे, आज हर आदमी मौक़ापरस्त है, किस मौक़े को कब भुनाना हैं, वह
अच्छी तरह जानता है। उसकी इस दक्षता को देखकर ऐसा लगता है, मानो मौक़ापरस्ती उसे घुट्टी
में पिलाई गयी हो । कोर्ट में बचाव पक्ष ने उनकी निष्कलंक बेटी पर चरित्रहीन होने का लांछन लगाया था।
कितनी छिछालेदर हुई थी उनकी । उधर बड़की के ससुराल वालांे की तरफ से भी धीमी पर सख़्त मांगे
ज़ारी थीं। ये सब सोचते-सोचते उनकी आँखों के सामने अन्धेरा सा छाने लगा। उन्होंने घबराकर अपनी घड़कन टटोली, और इस बात से निश्चिंत होकर कि, उनका हृदय धड़क रहा है, और वे अभी भी जीवित हैं, उन्होने अपनी बेचैनी बाँटने के उद्देश्य से अपनी पत्नी को आवाज़ दी...‘‘लक्ष्मी’’। मास्टरजी को खुद अपनी आवाज़ किसी अंधे कुएँ से आती हुई प्रतीत हुई। उनकी मंद आवाज़ की अभ्यस्त उनकी पत्नी रसोई से हाथ धोती
हुई निकली। वह मास्टरजी की मनःस्थिति से अच्छी तरह से परिचित थी। ‘‘लक्ष्मी मैं हमेशा इसी
चिंता में लगा रहता हूँ, कि हम छुटकी का ब्याह कैसे कर पायेंगे। मँझली हत्याकाण्ड के बाद तो मेरे हाथ पाँव ही फूल गये हैं।’’ तिवारीजी ने अपनी चिन्ता बतायी। ‘सुनियेजी, छुटकी के लिये राकेश कैसा रहेगा ? अच्छी
सरकारी नौकरी में है। कितना सम्मान करता है वह हमारा ।’ पण्डिताईन ने अपनी राय ज़ाहिर की। ‘‘ये क्या कह रही हो भागवान ? हम ठहरे उच्चकुलीन कान्यकुब्ज बाह्मण और कहाँ वो हरिजन । अरे हमें समाज में
रहना है कि नहीं। समाज के लोग हमें जात-बाहर कर देंगे। अरे हमारी लाश को कौन हाथ लगायेगा। सड़ती पड़ी रहेगी।’’ कहते-कहते उनके ललाट पर फिर पसीने की बूँदे चमकने लगीं । ‘‘देखिये जी आजकल ये सब बेकार की बातें हैं। आखिर समाज ने हमें दिया ही क्या है, सिवाय असुरक्षा की भावना के। किस समाज की बात कर रहे हैं आप ? क्या उसी समाज की, जहाँ दूल्हों की नीलामी होती है, और बोली लगाने के चक्कर में वधू-पक्ष के लोग बिक जाते हैं, या उस समाज की बातें कर रहे हैं, जो अपने बनाये जाल में खुद ही फँस गया है। हमारे समाज के द्वारा फैलाये गये पाखण्ड के जाल में दूसरे तो फँसते नहीं है, उलटे हमें ही अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सब कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं । मँझली का हश्र तो आप देख ही चुके हैं । रही बात जात बाहर
करने, और हमारी लाश के सड़ते रहने की, तो सुनिये हम जीते जी जिस काया की क़द्र नहीं करते, उसे दुनिया भर के व्यसनों से नष्ट-भ्रष्ट करते रहते हैं, उस काया की मरने के बाद चिंता क्यों करें। ज़्यादह ही है तो हम समाज की आँखों में धूल झोंकने के लिये छुटकी की शादी के बाद उसे मरा घोषित कर उसका पिण्डदान कर देंगे। इससे समाज का थोथा अहं भी शांत हो जायेगा । हमारी बेटी सुख से रहे, इससे ज़्यादा हम और क्या चाहेंगे। छुटकी कह रही थी, कि राकेश काफी प्रतिभाशाली है। उसका सिलेक्शन सामान्य सीट से हुआ है। दरअसल व्यवस्थागत दोषों के चलते हम हरिजनो के प्रकृति-प्रदत्त गुणों की उपेक्षा कर जाते हैं । हम उनकी
प्रतिभा का मूल्यांकन आरक्षण का चश्मा पहनकर करते हैं । ये उनके साथ अन्याय है। छुटकी यह भी बता रही थी कि, राकेश घर से भी अच्छा सम्पन्न है । पिछली बार जब आपकी तबीयत खराब हुई थी, तो कितनी मदद की थी उसने...तब कहाँ था आपका समाज ? छुटकी तो यह भी बता रही थी कि, उनके समाज के लोग बड़े उदारमना होते हैं । वे सभी को अपने समाज में मिला लेते हैं । हमें तो ऐसे लोगों से सीख लेनी चाहिए । हम क्या सामाजिक कुरीतियों का पोषण करने के लिये ही उच्च वर्ग के हैं । छुटकी ने तो मुझे घुमा-फिरा कर बता ही दिया है, कि दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं, और हमारी स्वीकृति चाहते हैं । अब हमें भी उन्हें स्वीकृति प्रदान कर ही देना चाहिये।’ पण्डिताईन ने अपनी राय दी । ‘‘पर यह सब होगा कैसे ? हम किस तरह उन्हें स्वीकृति प्रदान करेंगे । स्पष्ट बोल पाने का साहस तो मुझमे बचा ही नहीं है ।’’ मास्टरजी ने पण्डिताईन से
सहमत होते हुए प्रश्न किया । ‘छुटकी बता रही थी कि, आज राकेश का बर्थ-डे है । आप ऐसा करिये बर्थ-डे के उपहारस्वरूप सिनेमा की दो टिकटें ले आइये, दोनों को एक साथ फिल्म देखने भेज देते हैं।’ पण्डिताईन ने
चहक कर कहा । थोड़ी देर विचार करने के बाद मास्टरजी के कदम टाकीज़ की ओर बढ़ने लगे । उनकी आँखों में अपनी बेटी की ख़ुशी के सपने उभरने लगे । सामने ही प्लेटफॅार्म पर लगने के लिये ट्रेन अपनी पटरी बदल
रही थी ।

 आलोक कुमार सातपुते
 09827406575
 832, हाउसिंग बोर्ड काॅलोनी
सड्डू, रायपुर (छ.ग.)

नपुंसक (लघुकथा) - सुधीर मौर्य

'देखो तुम्हारे अतीत को जानते हुए भी मैने तुमसे शादी की।पति सुहागरात को पहले लैंगिक संसर्ग के बाद से बोला।
पत्नी
पत्नी ने पति की बात सुनकर अपनी झुंकी आँखे और झुंकी दी।
'कहो अब कौन महान है मैं या वो तुम्हारा प्रेमी ?' पति वापस तनिक घमंड से बोला।
पत्नी अब भी वैसे ही बैठी रही। मूक और नत मुख।
'कहीं वो नपुंसक तो नहीं था?' पति, पत्नी के मन में उसके प्रेमी के लिए घृणा का भाव पैदा करने की गर्ज़ से बोला।

पति की बात सुनकर पत्नी को वो दिन याद गए जब वो अपने प्रेमी के साथ प्रेम गीत गाती थी।  

उसका प्रेमी उसे बेहद प्रेम करता था  कई बार वो उसके साथ एक ही चादर में लेटा था पर कभी चुम्बन आदि से आगे बढ़ा। और फिर एक रात जब उसने  खुद काम के वश    में होकर अपने प्रेमी से कहा 'उसकी इच्छा पूरी करो' तभी उसने उसके साथ दैहिक सम्बन्ध बनाया।
पत्नी को चुप देख पति वापस बोला - 'क्या वो वाक़ई नपुंसक था। '
पत्नी का मन किया वो कह दे अपने पति से - नपुंसक वो नहीं था जो प्रेम की पवित्रता निभाता रहा, जो हर राह में मेरे साथ में खड़ा रहा। मेरी पढ़ाई का खर्च उठता रहा। मेरे एक बार कहने पर चुपचाप मेरी ज़िन्दगी से दूर हो गया। और तुम्हारे मांगे के दहेज़ की राशि उसने दी अपने सिद्धांतो के विरुद्ध जाके।  अरे नपुंसक तो तुम हो जो अच्छी खासी नौकरी करते हुए भी बिना दहेज़ के शादी को तयार नहीं हुए।
पत्नी अभी सोच ही रही थी कि पति ने खींच कर वापस उससे लैंगिक संसर्ग करने लगा और पत्नी चुपचाप एक 'नपुंसक' के सीने से चिपट गई।

--सुधीर मौर्य

स्पर्श ( लघु कहानी )



अरे , कितनी सुंदर शाल है स्वाति.... कहाँ ली ? तुम पर बहुत फब रही । ऑफिस पहुँचते ही स्वाति की सहयोगी लड़की ने पूछा । ये मेरे दोस्त .... कहते कहते स्वाति चुप हो गई । अजीब सी उदासी छा गई उसके चेहरे पे और वो अपनी सीट पर आकर बैठ गई । बीते लम्हें एक एक करके उसकी आँखों के सामने आने लगे । कितने खुश थे वो दोनों ... मातुल और वो .. ये शाल मातुल ने ही तो दी थी उसको जब एक लम्बे अंतराल के बाद वो मिले थे । उस सर्द सुबह कैसे भूल सकती है वो । मातुल ने ये शाल देती बार उससे कहा था - स्वाति , ये शाल कभी खुद से अलग न करना .. सम्भाल कर रखना इसे । जब भी इसे ओढ़ोगी इसकी गर्माहट तुम्हे मेरी दोस्ती और प्यार का स्पर्श महसूस करवाती रहेगी ।एक खुशनुमा समय बिता कर वो फिर अलग हो गये ये सोच कर कि जल्द ही फिर से मिलेंगे । पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था ।कुछ समय बाद मातुल की जिंदगी में ऐसा क्या हुआ की सब बदल गया ये स्वाति आज तक नही जान पाई थी । एक दिन मातुल का फोन आया - स्वाति , मैं बहुत बुरा हूँ । मुझे भूल जाओ । स्वाति की लाख मिन्नत करने के बाद भी उसने और कुछ नहीं कहा । उसकी आवाज़ में पसरी उदासी को स्वाति खूब महसूस करती थी । उससे बेहतर मातुल को और कौन जान सकता था । वो भी खामोश हो गई थी उस दिन से । पहले लफ्ज़ बोलते थे उनके बीच .. अब ख़ामोशी बोलती थी । कुछ रिश्तों का स्पर्श तन से नहीं मन से महसूस होता है शायद !!

सु..मन

बदलता समय [लघुकथा ] --- अशोक दर्द

आज नेता जी फिर हमारे गाँव आ रहे थे | दस बर्ष के अंतराल बाद | पहली बार वह तब आये थे जब उनकी जीत हुई थी और इस क्षेत्र से भरपूर वोट मिले थे | दूसरी बार वह हार गये थे | अब तीसरी बार के चुनाव में जीत गये थे और मौका था एक कमरे के उद्घाटन का | यद्यपि यह कमरा पिछली सरकार ने बनवाया था परन्तु उद्घाटन नहीं कर पाई थी | चुनावों के बाद इस उद्घाटन के कार्य को यह नेता जी पूरा कर रहे थे | पिछली बार दस वर्ष पहले जब वह यहाँ आये थे तब बड़े जोर-शोर से उनके लिए और उनकी सरकार के लिए नारे लगे थे | फूलों के हारों से उनका गला सिर तक भर गया था | सलाम बजाने वालों की लंबी कतार लगी थी | लोगों ने उनके आश्वासनों पर खूब तालियाँ बजाई थीं |यह सारा दृश्य अब तक उनके जहां में जिन्दा था | अब की बार भी नेता जी की ऐसी ही अपेक्षा थी | मगर गाड़ी से उतरते ही उनके गले में थोड़े से हार डले , नारेबाजी भी कम ही हुई तो नेता जी एक आदमी के कान में फुसफुसाये,बोले – नारे तो लगाओ | फिर थोड़े से लोगों ने फिर से थोड़े – बहुत नारे लगाये | काफिला रास्ते में चलता हुआ आगे बढ़ रहा था | उद्घाटन वाले कमरे तक पहुंचने के लिए अभी कोई आधा किलो मीटर रास्ता बचा था तभी नेता जी ने देखा – चालीस – पचास युवा रास्ते में बैठे उनका इंतजार कर रहे हैं | ये देखकर नेता जी खुश हुए |सोचा ये सब मेरे स्वागत के लिए बैठे हैं |देखते ही देखते युवाओं ने रास्ता रोक लिया | नेता जी सहम गये | युवाओं की तरफ से विगत दस वर्षों के निरुत्तर प्रश्नों की बौछार नेता जी पर होने लगी | नेताजी के पास इस बौछार का कोई सटीक जबाब नहीं था | वह घबरा गये | बोले , इन्हें रास्ते से हटाओ |पुलिस उनपर टूट पड़ी | उसने युवाओं को तितर – बितर कर दिया | कुछ पल पहले नेता जी ने नारों के लिए खुद कहा था , अब स्वतः ही पूरी घाटी नारेबाजी से गूँज उठी थी ,परन्तु ये नारे जिन्दावाद के नहीं अपितु मुर्दावाद के थे | नेता जी बच् – बचाकर सुरक्षित जगह पहुँचाए गये | नेता जी को लगा समय बदल गया है | अब युवाओं को झूठे आश्वासनों से बरगलाने का समय नहीं रहा है ||

प्रवास कुटीर गाँव व डा. बनीखेत
तह. डलहौज़ी जिला चम्बा [हि.प्र.]
पिन -176303

भाई दूज लघुकथा

 दीपावली के तीसरे दिन यानी भाई दूज के दिन मैं अपने परिजनों और पारिवारिक मित्र के साथ भोपाल के न्‍यू मार्केट में टॉप एन टाऊन आईस्‍क्रीम पॉर्लर से आईस्‍क्रीम ले दुकान के सामने ही खडे-खडे खा रहा था । मैंने आईस्‍क्रीम जल्‍दी खत्‍म कर लिया। दूसरे अभी खा ही रहे थे । इसलिए मेरे पास थोड़ा समय था । मेरे जूते काफी गंदे हो रहे थे । साथ के फुटपाथ पर तीन-चार बूट पॉलिश वाले बैठे हुए थे । समय का सदुपयोग करने के लिए मैं उस ओर बढ़ा । एक चालीस -पैंतालीस वर्षीय पॉलिशवाला जो उस समय खाली बैठा था, मैंने अपने जूते खोल कर उसे अच्‍छे से पॉलिश कर चमकाने के लिए कहा । वह पॉलिश करने में तल्‍लीन हो गया । मैं उसे ध्‍यान से देखने लगा । उस के बाल बिखरे हुए थे । उस ने शायद कंघी नहीं की थी । बालो पर धूल सी जमी थी । शायद वह काफी दिनों से नहाया भी नहीं था । चेहरे पर बेतरतीव दाढ़ी उगी थी । आंखों की कोरों में कीच भी जमी हुई थी । कुर्ता- पजामा भी काफी मैले दिख रहे थे । उन पर जगह-जगह पालिश के धब्‍बे लगे हुए थे । कुल मिला कर उस का हुलिया अच्‍छा नहीं था ।

मैं अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे अभी उस का मुआयना कर ही रहा था कि मुझे किसी ने पीछे से हल्‍के से धक्‍का दिया । मैंने चौंक कर पीछे देखा । एक लंबा, हट्टा- कट्टा, झक सफेद डिजाईनर शेरवानी में सजा एक व्‍यक्ति  मुझे पीछे हटने का इशारा कर रहा था । उस के साथ एक महिला और बारह-तेरह साल की लड़की भी थी। वे दोनों भी सुंदर और नए वस्‍त्रों में थी । महिला सोने के गहनों से लदी थी । उस ने सिर पर पल्‍लू रखा हुआ था । वे उस सज्‍जन की पत्‍नी और बेटी थी ।

मैं पीछे हट गया। उस सज्‍जन ने झुक कर दोनों हाथों से मेरे जूते पॉलिश करते अधेड़ के दोनों पैर छुए और फिर अपने हाथों को दोनों आंखों से लगा लिया। फिर जगमग वस्‍त्रों और आभूषणों से लदी महिला ने भी पॉलिश करते उस व्‍यक्ति के चरण स्‍पर्श किये। उसने उस के चरणों में झुकी महिला के सिर पर हाथ रखा । मेरे साथ ही बहुत से लोगों की आंखें भी इस ओर उठी थी । वे दोनों पीछे हटे तो बूट पॉलिश वाले ने अपनी जेब में हाथ डाला और जेब में पड़े सभी नोटों को नीचे बिछाए बोरी पर रख दिया । दस- बीस और पचास के मुड़े- तुड़े बहुत सारे नोट थे। उस ने उन में से कुछ लड़की को देना चाहा तो उस सज्‍जन ने लड़की को उन्‍हें लेने से मना कर दिया ।

फिर उन के बीच वार्तालाप होने लगी-  कैसे हैं ? शाम को घर आना । मैं सब्‍जी आदि बना कर रखूंगाआदि। इस दौरान पॉलिश वाले की आंखें बरसने- बरसने को तैयार दिख रही थी । उस का गला भी शायद भर आया था । क्‍योंकि वह बड़ी मुश्किल से बोल पा रहा था। फिर वे तीनों जैसे आए थे, वैसे चले गए ।

मैं फिर से बूट पॉलिश करने वाले के सामने खड़ा हो गया । मेरे मन में शंका थी। उस ने मेरे मन के भाव शायद पढ़ लिए थे। बोला-  मेरा छोटा भाई है। सरकारी नौकरी में है। लेकिन मेरी बहुत इज्‍जत करता है।  आज के जमाने में इज्‍जत से बढ़ कर क्‍या है ? उसने मुझ से प्रश्‍न किया। इस बीच वह मेरे जूते पॉलिश कर चुका था। मैंने जूते पहने और उसे पैसे दिए। मेरे मन में उस बूट पालिश करने वाले के बारे में उथल-पुथल मच गई थी । उस की जो स्थिति थी और उस के छोटे भाई की जो स्थिति दिख रही थी, उस सब से दूर उन में एक अटूट रिश्‍ता था !  भाई का रिश्‍ता, अपनों की संवेदना का रिश्‍ता। उस दृश्‍य को देखने के बाद मैं सोच रहा था कि उस मोची का भाई दूज वास्‍तव में सार्थक हो गया था ।
                                                                                                 - शेर सिंह
                                                 के.के.- 100
                                          कविनगर, गाजियाबाद - 201 001
                                                                              E-Mail - Shersingh52@gmail.com

पुण्‍य लाभ लघुकथा

तीर्थ स्‍थली पुरी में भगवान जगन्‍नाथ के उस बहुत बड़े मंदिर में जा कर उसने जहां -कहीं भी मूर्तियां, तस्‍वीरें, फल- फूल चढ़ाए हुए स्‍थान देखे, वह श्रद्धा और आदर से उन के आगे नत मस्‍तक हो कर अपना शीश झुकाता रहा । दरअसल, वह अपने एक प्रिय जन की अकाल मृत्‍यु के पश्‍चात मंदिर में दिवंगत आत्‍मा की शांति और अपने मन को संतोष देने और पुण्‍य कमाने के इरादे से आया था ।
बहुत देर तक भगवान की मूर्तियों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के पश्‍चात एवं मंदिर की प्रदक्षिणा कर बाहर निकला तो मंदिर के आस- पास, बैठे- खड़े कुछ भिखमंगों को अपने प्रिय बन्‍धु को स्‍मरण करते हुए पच्‍चीस -पचास पैसों के सिक्‍के फैंकते हुए  आगे   बढ़ता रहा। जेब में पड़ी थोड़ी सी रेजगारी जब खत्‍म हो गई, तो उसने भिखारियों को और आगे बढ़ने से रोक दिया । लेकिन एक भिखारी जिसे शायद कुछ नहीं मिला था, उस के पीछे ही पड़ गया । " मोते भी दियो बाबू मोते भी दिया बाबू " की रट लगा कर । भिखमंगा जब उस के साथ ही हाथ फैलाए चलने लगा तो वह असहज होने लगा । और, फिर उस को गुस्‍सा आ गया । उस ने एक नजर इधर - उधर डाली और एक झन्‍नाटेदार चांटा भिखमंगे  के गाल पर जड़ दिया । भिखमंगा गाल पकड़े अविश्‍वास से खड़ा रह गया । परन्‍तु पल भर में भिखमंगे की आंखें घृणा से भर उठी थी । और, वह संतोष से आगे बढ़ गया जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
   
                                                      शेर सिंह
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मजनुओं की कमी नहीं



टेम्‍पों में ज्‍यादा सवारियां नहीं थी।  आमने -सामने दोनों तरफ की सीटों पर कुल छ: जने बैठे हुए थे। शाम का समय था । टेम्‍पों इंदिरा नगर के पॉलीटेक्निक चौक से गोमती नगर को जा रही थी । गोमती नगर में हॅनीमेन चौराहा टेम्‍पों का अंतिम स्‍टॉप था ।

टेम्‍पों में दो महिलाएं और अन्‍य सभी पुरूष लोग बैठे हुए थे। सभी अधेड थे । सब की उम्र पैंतालीस से पचास के बीच लग रही थी । दोनों महिला सवारी एक तरफ की सीट पर साथ- साथ बैठी हुई थी । उन दोनों के ठीक सामने बैठा अधेड़ कुछ फिल्‍मी अंदाज में नौजवानों की तरह एक फिल्‍मी गीत बेसुरी आवाज और भोंडे तरीके से गाने की कोशिश कर रहा था। लगता था, अधेड़ को अपनी उम्र का जरा भी लिहाज और अहसास नहीं है । सामने बैठी महिला को ऊपर - नीचे एकटक देखते हुए वह गाने की कोशिश कर रहा था। शक्‍ल- सूरत से  वह भद्र दिख रहा था । लेकिन उस की हरकतें किसी आवारा लौंडे जैसी दिख रही थी । संभवत: वह दारू पिये हुए था । सामने बैठी अधेड़ महिला नाक- भौंह सिकोड़ रही थी । लेकिन वह कुछ बोल नहीं रही थी । स्‍पष्‍ट था कि वह सामने वाले की हरकतों से परेशान हो रही है। वैसे लखनऊ उत्‍तर प्रदेश के सब से सभ्‍य शहरों में माना जाता है ।

विवेकखंड आते- आते कुछ सवारियां चढ़ी और कुछ उतरीं । पर उस अधेड़ का गाना और महिला की ओर झुक - झुक पड़ना बदस्‍तूर जारी था । मैं कुछ समय तक इन हरकतों को देखता रहा । जब मेरे पास वाली सवारी उतरी तो मैंने उस महिला की परेशानी को भांप अपने पास की खाली सीट पर बुला लिया। लेकिन उस अधेड़ व्‍यक्ति की हरकतें अब और अधिक बढ़ गई थी । हर कोई उस की उम्र और उसे शराब के प्रभाव में जान उसे नजरअंदाज कर रहा था । पर वह अपनी ओछी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था । फिर वह उठा और महिला के पास आ कर बैठ गया और भोंडी हरकतें करते हुए उल - जलउल बकने लगा । महिला का चेहरा बता रहा था कि वह अधिक असहज है और अपने आप को अपमानित

महसूस कर रही है । लेकिन हर कोई चुप बैठा हुआ था । जब मुझ से रहा नहीं गया तो मैंने अधेड़ को दूसरी सीट पर बैठने के लिए कहा । आश्‍चर्य, वह बिना
किसी प्रतिवाद के मान गया और दूसरी सीट पर बैठ गया । परन्‍तु उस की हरकतें जारी थीं  और अब वरदाशत से बाहर होती जा रही थी ।  महिला शायद अब डर गई थी ।
शक्‍ल- सूरत और पहनावे से महिला सिंधी या पंजाबी लगती थी । सुसंस्‍कृत और भले घर की ।  महिला मेरी तरफ कुछ सिकुड़ कर बैठ गई थी । उन दोनों के बीच मैं जैसे दीवार बन गया था ।

हुसैडिया चौराहे पर सभी सवारियां उतरने लगी । मजनू की तरह हरकतें करते उस अधेड़ ने टेम्‍पों से उतरते- उतरते महिला का हाथ पकड़ लिया । महिला ने जोर से " इडिएट " कह कर अपना हाथ झटके से छुड़ा लिया और तेज कदमों से दौड़ती हुई सी एक ओर को बढ़ गई । अधेड़ पुरूष उस ओर देखता हुआ महिला को ऊंची आवाज में बुलाने लगा । अधेड़ अपनी उम्र का लिहाज किये बिना लहक रहा था और आस- पास खड़े लोग उस की अदाओं पर हंस- हंस कर लोट-पोट हो रहे थे । लेकिन किसी ने उस शराबी  को समझाने या चुप कराने की कोशिश नहीं की। लोगों के लिए यह जैसे एक  मुफ्त का   मनोरंजन था । परन्‍तु महिला के प्रति लोगों में कोई सहानुभूति, कोई संवेदना नहीं दिख रही थी । 

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