रिटायर्ड मास्टर तिवारीजी बड़ी ही बेचैनी से चहलकदमी कर रहे थे। अपने ललाट पर उभर आई पसीने की बूँदांे को वे बार-बार अपनी धोती से पोंछते। एक अजीब सी असुरक्षा की भावना घर कर गई थी उनमें। तीन
लडकियाँ थीं उनकी। बड़की और मँझली की शादी करने में वे लगभग बिक ही चुके थे, अब तीसरी सर पर सवार थी। वे छुटकी के भविष्य के प्रति आशंकित थे। इसी चिन्ता में उन्हें रात भर नींद न आती। सोते समय ऐसे करवटें बदलते, मानांे बिस्तर में काँटे उग आये हों। मँझली बेटी के दहेज़ लोभी ससुराल वालों ने उसे जलाकर मार डाला था। कुछ समाजसेवी संगठन और पत्रकार वग़ैरह कुछ दिनों तक थोथी सहानुभूति
दिखाते रहे, और उसके बाद अब हम क्या कर सकते हैं, हमें जितना करना था, कर चुके आदि जुमले
बोलने लगे। तिवारीजी सोचने लगे, आज हर आदमी मौक़ापरस्त है, किस मौक़े को कब भुनाना हैं, वह
अच्छी तरह जानता है। उसकी इस दक्षता को देखकर ऐसा लगता है, मानो मौक़ापरस्ती उसे घुट्टी
में पिलाई गयी हो । कोर्ट में बचाव पक्ष ने उनकी निष्कलंक बेटी पर चरित्रहीन होने का लांछन लगाया था।
कितनी छिछालेदर हुई थी उनकी । उधर बड़की के ससुराल वालांे की तरफ से भी धीमी पर सख़्त मांगे
ज़ारी थीं। ये सब सोचते-सोचते उनकी आँखों के सामने अन्धेरा सा छाने लगा। उन्होंने घबराकर अपनी घड़कन टटोली, और इस बात से निश्चिंत होकर कि, उनका हृदय धड़क रहा है, और वे अभी भी जीवित हैं, उन्होने अपनी बेचैनी बाँटने के उद्देश्य से अपनी पत्नी को आवाज़ दी...‘‘लक्ष्मी’’। मास्टरजी को खुद अपनी आवाज़ किसी अंधे कुएँ से आती हुई प्रतीत हुई। उनकी मंद आवाज़ की अभ्यस्त उनकी पत्नी रसोई से हाथ धोती
हुई निकली। वह मास्टरजी की मनःस्थिति से अच्छी तरह से परिचित थी। ‘‘लक्ष्मी मैं हमेशा इसी
चिंता में लगा रहता हूँ, कि हम छुटकी का ब्याह कैसे कर पायेंगे। मँझली हत्याकाण्ड के बाद तो मेरे हाथ पाँव ही फूल गये हैं।’’ तिवारीजी ने अपनी चिन्ता बतायी। ‘सुनियेजी, छुटकी के लिये राकेश कैसा रहेगा ? अच्छी
सरकारी नौकरी में है। कितना सम्मान करता है वह हमारा ।’ पण्डिताईन ने अपनी राय ज़ाहिर की। ‘‘ये क्या कह रही हो भागवान ? हम ठहरे उच्चकुलीन कान्यकुब्ज बाह्मण और कहाँ वो हरिजन । अरे हमें समाज में
रहना है कि नहीं। समाज के लोग हमें जात-बाहर कर देंगे। अरे हमारी लाश को कौन हाथ लगायेगा। सड़ती पड़ी रहेगी।’’ कहते-कहते उनके ललाट पर फिर पसीने की बूँदे चमकने लगीं । ‘‘देखिये जी आजकल ये सब बेकार की बातें हैं। आखिर समाज ने हमें दिया ही क्या है, सिवाय असुरक्षा की भावना के। किस समाज की बात कर रहे हैं आप ? क्या उसी समाज की, जहाँ दूल्हों की नीलामी होती है, और बोली लगाने के चक्कर में वधू-पक्ष के लोग बिक जाते हैं, या उस समाज की बातें कर रहे हैं, जो अपने बनाये जाल में खुद ही फँस गया है। हमारे समाज के द्वारा फैलाये गये पाखण्ड के जाल में दूसरे तो फँसते नहीं है, उलटे हमें ही अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सब कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं । मँझली का हश्र तो आप देख ही चुके हैं । रही बात जात बाहर
करने, और हमारी लाश के सड़ते रहने की, तो सुनिये हम जीते जी जिस काया की क़द्र नहीं करते, उसे दुनिया भर के व्यसनों से नष्ट-भ्रष्ट करते रहते हैं, उस काया की मरने के बाद चिंता क्यों करें। ज़्यादह ही है तो हम समाज की आँखों में धूल झोंकने के लिये छुटकी की शादी के बाद उसे मरा घोषित कर उसका पिण्डदान कर देंगे। इससे समाज का थोथा अहं भी शांत हो जायेगा । हमारी बेटी सुख से रहे, इससे ज़्यादा हम और क्या चाहेंगे। छुटकी कह रही थी, कि राकेश काफी प्रतिभाशाली है। उसका सिलेक्शन सामान्य सीट से हुआ है। दरअसल व्यवस्थागत दोषों के चलते हम हरिजनो के प्रकृति-प्रदत्त गुणों की उपेक्षा कर जाते हैं । हम उनकी
प्रतिभा का मूल्यांकन आरक्षण का चश्मा पहनकर करते हैं । ये उनके साथ अन्याय है। छुटकी यह भी बता रही थी कि, राकेश घर से भी अच्छा सम्पन्न है । पिछली बार जब आपकी तबीयत खराब हुई थी, तो कितनी मदद की थी उसने...तब कहाँ था आपका समाज ? छुटकी तो यह भी बता रही थी कि, उनके समाज के लोग बड़े उदारमना होते हैं । वे सभी को अपने समाज में मिला लेते हैं । हमें तो ऐसे लोगों से सीख लेनी चाहिए । हम क्या सामाजिक कुरीतियों का पोषण करने के लिये ही उच्च वर्ग के हैं । छुटकी ने तो मुझे घुमा-फिरा कर बता ही दिया है, कि दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं, और हमारी स्वीकृति चाहते हैं । अब हमें भी उन्हें स्वीकृति प्रदान कर ही देना चाहिये।’ पण्डिताईन ने अपनी राय दी । ‘‘पर यह सब होगा कैसे ? हम किस तरह उन्हें स्वीकृति प्रदान करेंगे । स्पष्ट बोल पाने का साहस तो मुझमे बचा ही नहीं है ।’’ मास्टरजी ने पण्डिताईन से
सहमत होते हुए प्रश्न किया । ‘छुटकी बता रही थी कि, आज राकेश का बर्थ-डे है । आप ऐसा करिये बर्थ-डे के उपहारस्वरूप सिनेमा की दो टिकटें ले आइये, दोनों को एक साथ फिल्म देखने भेज देते हैं।’ पण्डिताईन ने
चहक कर कहा । थोड़ी देर विचार करने के बाद मास्टरजी के कदम टाकीज़ की ओर बढ़ने लगे । उनकी आँखों में अपनी बेटी की ख़ुशी के सपने उभरने लगे । सामने ही प्लेटफॅार्म पर लगने के लिये ट्रेन अपनी पटरी बदल
रही थी ।
आलोक कुमार सातपुते
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