खटनोल और भज्‍जी नरेश देयोग

बात सन् १५૪० की है जब पूरा हिमाचल शेरशाह सुरी के सेनापति
खवासखान के अाक्रमणों से त्रस्त था । भज्जी का शासक आलमचंद भी अपने विजय अभियान पर था । उसने कोटी के शासक गोपीचंद को नालदेहरा की लड़ाई में’ बुरी तरह हराया जिसमें दोनों अोर के १८०० लोग मारे गए । इसके पश्चात वह सांगरी व मधान की अोर मुड़ा अौर उन्हें भज्जी में’ मिला लिया ।
लेकिन इससे पहले कि वह वापिस मूलभज्जी पहुंचता गोपिचंद ने अपनी हार का बदला लेते हुए आलमचंद की अनुपस्थिति का फ़ायदा उठाया अौर बेड़ों(राजमहल) को जला डाला अौर भज्जी के काटली,जाबल आदि स्थानों पर कब्जा कर दिया।
अब उसे अन्यत्र राजधानी के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश थी जो उसे तत्कालीन खाट (जिसे बाद में’ बठोल अब खटनोल कहा गया)के रूप में’ मिला अौर भज्जी की राजधानी खटनोल बनी जो १६८८ तक रही । बाद में’ सोहनपाल ने सुन्नी को बसाया ।
(गजैटियर के अनुसार आलमचंद को २९वीं पीढ़ी का कहा गया जो जनश्रुतियों एव़ कालखंड से मेल नहीं खाता)

दशहरा ---- कुमारसैन

दशहरा सभी स्‍थानों पर परम्‍परागत और हर्षोल्‍लास के साथ मनाया जाता है । स्‍थान छोटा हो या बड़ा आस्‍था के दर्शन सभी जगहों पर होते है । मेरे कस्‍बे में लगभग 15 वर्षों के बाद रामलीला का मंचन किया गया। सभी ने हर्षोल्‍लास के साथ मंचन में साथ दिया। आज दशहरा पर लोगों में हर्ष व्‍याप्‍त था। कुछ तस्‍वीरें दशहरा आयोजन की 


















हिमाचल प्रदेश का पूर्व राज्य पक्षी मोनाल का अस्तित्व खतरे में



मोनाल
जुजुराणा

कुल्लू हि.प्र (प्रताप अरनोट) : हिमाचल प्रदेश राज्य पक्षी मोनाल की पदवी कुछ वषों पहले छिन जाने के कारण आज मोनाल का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। मोनाल के सिर में खूबसूरत कलगी तथा स्वादिष्ट मांस के लिए इसका शिकार शुरू से होता आ रहा है। ऐसा जाहिर हे कि मोनाल की कलगी और मांस की मांग के चलते इसका अंधाधुंध शिकार होने के कारण शंख्या में भारी कमी आ जाने तथा राजनीतिक के शिकार की बजह से राज्य पक्षी का ताज मोनाल से छिन कर उसी की तरह खूबसूरत पक्षी जुजुराणा(वेस्टर्न हिमालयन ट्रेगोपेन) को राज्य पक्षी के ताज से अंलकृत कर दिया गया। जिसके चलते आज मोनाल की तरपफ विभाग तथा सरकार भी खास तव्वजो नहीं दे रही है।

जुजुराणा
      उल्लेखनीय है कि 2400 मी. से 4500 मी. की उंचाई पर वर्फ की पहाड़ियों में रहने वाला पक्षी मोनाल हिमाचल प्रदेश के अलावा सिक्किमअरूणाचल प्रदेशकशमीर तथा तिब्बत व भूटान में भी पाया जाता है। मोनाल नेपाल का राष्ट्रीय तथा उतराखण्ड का राज्य पक्षी के सिंहासन पर विराजमान है जिसे डॉपफे के नाम से जाना जाता है। परन्तु हिमाचल प्रदेश में इससे राज्य पक्षी की जबरजस्ती पदवी छिन ली गई। यह पक्षी भारी वपर्फवारी की वपर्फली  पहाड़ियों में अपना भोजन जमीन की जड़ों को खोद कर पेट पाल लेता है। अपैल से अगस्त माह के बीच मोनाल जोड़ों में दिखाई देता है। नर मोनाल की खूबसूरत कलगी(शिखा पंख) और स्वादिष्ट मांस ही इसके सबसे ज्यादा जान के दुश्मन हैं। हिमाचल प्रदेश में इसकी कलगी को लोग अपनी टोपी में लगाना अपनी शान समझते हैं। लोग इसके मांस के भी बहुत शोकीन हैंजिसके के चलते इसका शिकार प्रदेश में अंधाधुंध जारी रहा जिसके कारण वन्य प्राणीयों में मोनाल की संख्या सबसे ज्यादा घटती जा रही है। राज्य पक्षी की पदवी छिनने के बाद मोनाल का विज्ञापनों तथा सरकारी व गैर-सरकारी इशितहारों से भी पता कट गया है। आज इसे बचाने व घटती संख्या पर सरकार व विभाग ने भी मुंह मोड़ लिया है। सन् 1982 से इस पक्षी का अंधाधुंध शिकार किया जाने लगा तो इसी वर्ष से सरकार ने मोनाल के शिकार पर कानून पास करके पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया परन्तु हैरानगी की बात है कि प्रतिबंध के बाद भी इसका शिकार धड़ले से चलता रहा। आज हालत यह है कि मोनाल की संख्या दिनप्रति दिन घटती गई और आज खत्म होने की कगार पर है। शिकारियों ने वन विभाग के कुछ कर्मचारियों के साथ मिलकर इस खूबसूरत पक्षी को कलगी और स्वादिष्ट मांस के लिए अवैध् तरीके से मारना जारी रहा और कलगी कई अपफसरों की टोपी व कोट की शान बनती रही तथा मांस पार्टियों में परोसता रहा। हालांकि कलगी को टोपी व कोट में लगाने के लिए पहले से ही संबध्ति विभाग से लाईसेंस लेने का प्रावधन है परन्तु देखा गया है कि बहुत ही कम लोग होंगें जिनके पास कलगी लगाने के लिए लाईसेंस होगा। हेरानी की बात यह है कि आज तक गिनेचुने ही शिकारीयों को सजा हुई है। अगर विभाग व सरकार संवेदनशील होती तो आज कई शिकारिओं को सजा हो सकती थी और वह सलाखों के पिछे होते । उल्लेखनीय है कि अध्कि शिकार के चलते मोनाल की घटती संख्या को देखते हुए ही विभाग व सरकार ने इससे राज्य पक्षी का ताज छिन लिया। उल्लेखनीय है कि सन् 2000 में गणना के अनुसार प्रदेश में राज्य पक्षी मोनाल की संख्या 65 हजार के करीब थी जबकि सन् 2005 की गणना के अनुसार इनकी जनसंख्या घटकर मात्रा 15 हजार ही रही गई। जिला कुल्लू में मोनाल की जनसंख्या एक वर्ग किला मीटर में 1 से 10 तक के लगभग थी। अब मोनाल को मात्रा सैंक्चूरी एरिया तथा राष्‍ट्रीय उद्यान में ही देखा जा सकता है। ग्रेट हिमालयन नैशनल पार्क के अधिकारियों का कहना है कि मोनाल की संख्या कम हुई है लेकिन इनकी पूर्णरूप से गिनती करना असंभव है। प्रदेश सरकार द्वारा भी इन लुप्त हो रहे वन्य प्राणियों के लुप्त हो रहे कारणों का पता लगाया जा रहा है तथा इनके सरक्षण एवं संवर्धन के लिए कार्य कर रही है।

            हिमाचल प्रदेश में अध्कि मात्रा में जल विद्युत परियोजनाओं के लगने के कारण जंगलों के भारी मात्रा में हुए कटान से वन्य प्राणियों की शरणास्थलीं क्षेत्रा दिन प्रति घटता गयाजिसके कारण इन पक्षियों के साथ अन्य वन्य प्राणियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता चला गया। इन परियोजनाओं के चलते सैंक्चूरी एरिया तथा राष्‍ट्रीय पार्क के क्षेत्रा भी चपेट में आ रहे हैं जो इन प्राणियों के लिए वेहद खतरनाक हो सकते हैं। हिमाचल प्रदेश के भारी मात्रा में परियोजनाएं बनने के बाद जनजातीय क्षेत्रा लाहुल-स्पीति एक मात्रा ऐसा क्षेत्रा बचा था जहां इन वन्य प्राणियों के लिए सुरक्षित था परन्तु अब सरकार की नजर इस क्षेत्रा पर भी पड़ चुकी है और कई जल विद्युत परियोजनाए इस क्षेत्रा में बनने की योजनाएं बना चुकी है जिसके चलते इन प्राणियों का भविष्य खतरे में है। 

                                                      सुरभि न्यूज एण्ड पफीचर एजेंसी
                                                            कटोच हाउस ढालपुर कुल्लू 
                                                             हिमाचल प्रदेश

लो क सं घ र्ष !: आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 8



इक्कीसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का इक्कीसवाँ सम्मेलन त्रिची, तमिलनाडु में 28-31 जनवर 1983 को हुआ। मार्च 1983 को दिल्ली में 7वाँ गुटनिरपेक्ष सम्मेलन आयोजित होना था जिसके समर्थन में ए0आई0एस0एफ0 ने कई सेमिनारों, गोष्ठियों और बैठकांे का आयोजन किया। युवा दिवस के अवसर पर दिल्ली से हुसैनीवाला तक साइकिल रैली आयोजित की गई जिस पर पंजाब के खालिस्तानी नेता भिंडरवाले के भाई की देख-रेख में हमला किया गया। दोहरी शिक्षा पद्धति के विरुद्ध सितम्बर 1983 में बनारस से देहरादून तक एक साइकिल जत्थे का आयोजन किया गया जिसमें 50 सक्रिय कार्यकर्ताओं ने भाग लिया और यह जत्था 1400 किलोमीटर का सफर तय करके 20 दिनोें में देहरादून पहँुचा। जहाँ दून स्कूल के बाहर इस जत्थे पर जबरदस्त लाठीचार्ज हुआ और इसमें कई छात्र नेता घायल हुए अतुल कुमार अंजान के सिर पर भी काफी चोट आईं। बावजूद इस सबके आंदोलनकारी छात्रों को जेल में ठूस दिया गया। ए0आई0एस0एफ0 ने इस दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की गैर जनवादी रिपोर्ट के खिलाफ जहाँ मार्च 1983 में अखिल भारतीय प्रतिरोध दिवस का आयोजन किया तो वहीं ए0आई0वाई0एफ0 के संसद मार्च में भी सक्रिय सहयोग किया। 13 सितम्बर को भी ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 ने मिलकर संयुक्त रुप से प्रतिरोध दिवस का आयोजन किया। जिसमें दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों से 5 हजार छात्रों ने भागीदारी की। इसके अलावा और 14 राज्यों में भी इसी दिन प्रतिरोध दिवस मनाया गया। ए0आई0एस0एफ0 ने 1984 में हुई इंटरनेशनल यूनियन आॅफ स्टूडेन्ट्स की 14वीं कांग्रेस में सोफिया (बुल्गारिया) में शिरकत की तो वहीं 1985 में मास्को में संपन्न 12 वें अन्तर्राष्ट्रीय छात्र एवं युवा महोत्सव में भी भाग लिया।
बाइसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का बाइसवाँ सम्मेलन 13-16 दिसम्बर 1985 को गुंटूर,
आन्ध्र प्रदेश में संपन्न हुआ। सम्मेलन के फौरन बाद 14 फरवरी 1986 को संगठन ने केन्द्र सरकार के शिक्षा पर नकारात्मक रुख वाले एक दस्तावेज के खिलाफ प्रतिरोध दिवस मनाया। इसके बाद 13 सित्मबर 1986 को भी सरकार की नई शिक्षा नीति के खिलाफ प्रतिरोध दिवस मनाया। यह वह समय था जब देश में एक तरफ अलगाववादी, साम्प्रदायिक और जातिवादी ताकतंे सिर उठा रही थीं जो देश की एकता अखण्डता के लिए गंभीर खतरा था तो दूसरी तरफ आम आदमी बढ़ती महँगाई और सरकार की जन विरोधी नीतियों से परेशान था। ऐसे समय में ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने संयुक्त रूप से ‘‘बचाओ भारत-बदलो भारत‘‘ नारे के तहत जनवरी से मार्च तक तीन साइकिल जत्थों के रूप में देश की एकता अखण्डता बनाए रखने के लिए और जनविरोधी नीतियांे के खिलाफ एक बड़े अभियान की शुरुआत की। इस कार्यक्रम का समापन 26 मार्च को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक रैली के रूप में हुआ जिसमें हजारों छात्रों नौजवानों ने भाग लिया।
0आई0एस0एफ0 की पचासवीं स्वर्ण जयन्ती
ए0आई0एस0एफ0 ने 50 साल पूरे होने पर लखनऊ में 12 से 14 अगस्त 1986 को बेहद शानदार तरीके से अपनी स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस आयोजन की शुरुआत पहले दिन की बड़ी रैली से हुई। स्वर्ण जयन्ती समारोह का उद्घाटन महान स्वतंत्रता सेनानी बाबा पृथ्वी सिंह आजाद ने किया। 22 देशों के बिरादराना संगठनों के 27 प्रतिनिधियों ने भी इस समारोह में भागेदारी की। ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना करने वालों में एक हरीश तिवारी के साथ एम0 फारुकी, ए0बी0 बर्धन, प्रशान्त सान्याल, विश्वनाथ मुखर्जी, गीता मुखर्जी, रमेश सिन्हा, सुनील सेनगुप्ता, शफीक नकवी, एच0के0 व्यास और प्रो0 संतोष भट्टाचार्य आदि आन्दोलन के कई वरिष्ठ साथियांे ने भी इस सम्मेलन में भाग लिया। समारोह के बहाने पुराने दिनों को याद करना, संगठन के लिए गौरवमयी पलांे को जीने के समान था और पुराने गौरव से मिलने का नए छात्रों का उत्साह भी उल्लेखनीय था।
इस यादगार समारोह के बाद ए0आई0एस0एफ0 ने नई शिक्षा नीति के खिलाफ आन्दोलन की फिर से कमान सँभाल ली। जहाँ सितम्बर 1988 में विरोध दिवस मना कर प्रतिरोध की शुरुआत की तो वहीं दिसम्बर 1986 को रेल रोको आंदोलन ने इस
विरोध को नई ऊँचाइयाँ दीं। 1988, छात्र युवा आंदोलन के उभार का समय था बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, केरल, मणिपुर, यू0पी0, आन्ध्र प्रदेश और दिल्ली में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कर्नाटक, राजस्थान में भी आंदोलन और प्रदर्शन हुए तो वहीं हरियाणा, पंजाब और यू0पी0 में छात्र-युवा कंवेंशन भी हुए। इसी समय पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन के कारण हालात बद से बदतर हो रहे थे। ए0आई0एस0एफ0 ने अन्य जनवादी और वामपंथी संगठनों के साथ मिलकर खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की कमान सँभाली। ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 ने आतंकवाद का सामना करते हुए अपने कई साथियों की कुर्बानी दी। ठीक इसी समय आर0एस0एस0 और भा0ज0पा0 के नेतृत्व में साम्प्रदायिक ताकतें भी मजबूत हो रही थी। राम जन्मभूमि और बाबरी मजिस्द को मुद्दा बनाकर हिंदू और मुस्लिम साम्प्रदायिकों ने देश में राजनैतिक ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिक विभाजन के एक नए युग की शुरुआत कर दी थी। देश की एकता अखण्डता को चुनौती देनी वाली इस साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति को भा0ज0पा0 की रथयात्रा ने साम्प्रदायिक सद्भाव की तबाही के रूप में बदल दिया। ए0आई0एस0एफ0 ने दूसरी धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के साथ मिलकर देश की एकता अखण्डता को बचाने के लिए सघन अभियान की शुरुआत की। यू0पी0 ए0आई0एस0एफ0 ने खासतौर पर धर्मनिरपेक्षता के लिए और साम्प्रदायिकता के खिलाफ राज्य व्यापी अभियान चलाया। यह वह समय था जब राजीव गाँधी अपनी साफ छवि के साथ सत्ता में आए थे परन्तु थोड़े दिन में ही उनकी यह छवि धूमिल हो चुकी थी। वाम और जनवादी शक्तियों के साथ मिलकर ए0आई0एस0एफ0 ने इस दौरान एक जुझारू आंदोलन की शुरूआत की जिसके तहत दिल्ली में ‘‘राजीव गांधी गद्दी छोड़ो‘‘ के नारे के साथ 9 दिसम्बर 1987 को एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया गया। इसी कड़ी में आगे चलकर 15 मार्च 1988 को आयोजित भारत बंद में भी ए0आई0एस0एफ0 ने देश भर में शिक्षण संस्थानों को बंद करवाने में बड़ी भूमिका अदा की। ए0आई0एस0एफ0 ने 30 अगस्त के भारत बंद में भी महत्चपूर्ण भाूमिका अदा की। ए0आई0एस0एफ0 -ए0आई0वाई0एफ0 ने मंडल कमीशन के समर्थन में और शिक्षा एवं काम के अधिकार की माँग को लेकर 9 सितम्बर 1990 को संसद के सामने बोट क्लब पर प्रदर्शन किया।
इसके अलावा कई अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दांे को लेकर भी ए0आई0एस0एफ0 ने जुझारू आंदोलन किए। स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के 50 छात्रों ने लीबिया पर अमेरिकी हमले के विरोध में दिल्ली के अमेरिकन सेन्टर पर कब्जा किया। 9 सितम्बर 1987 को नेल्सन मंडेला की आजादी और नस्लवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया। 2 अक्टूबर 1987 को दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के प्रति एकजुटता दिवस के रूप में मनाया गया। इसी दिन दिल्ली ए0आई0एस0एफ0 के छात्र-छात्राओं ने ब्रिटिश काउंसिल पर कब्जा करके विरोध व्यक्त किया। नेल्सन मंडेला के जन्म दिवस के मौके पर उनकी रिहाई के लिए ए0आई0एस0एफ0 ने ब्रिटिश काउंसिल के समक्ष प्रदर्शन किया और इसके अलावा केरल इकाई ने 50 हजार हस्ताक्षर करा कर विरोध व्यक्त किया। इसी बीच ए0आई0एस0एफ0 ने फिलीस्तीन के समर्थन में भी कईं कार्यक्रमों का आयोजन किया। 18 मई 1988 को फिर ए0आई0एस0एफ0 ने अमरीकन सेन्टर पर कब्जा करके फिलीस्तीन की संयुक्त राष्ट्र से सदस्यता समाप्त करने सम्बंधी बयान का विरोध किया। 8-15 दिसम्बर 1988 को ए0आई0एस0एफ0 केरल ने फिलीस्तीन सप्ताह के रूप में मनाया। 13 वें विश्व छात्र-युवा महोत्सव का आयोजन जुलाई 1987 में किया गया जिसकी तैयारी के लिए कई कार्यक्रम भारत में भी आयोजित किए गए।
23वाँ ए0आई0एस0एफ0 सम्मेलन
ए0आईएसएफ का 23वाँ सम्मेलन फरवरी 1991 में बोकारो में आयोजित किया गया। इस समय तक कई राजनैतिक बदलाव और आंदोलन देश भर के पैमाने पर हो रहे थे जिसमें ए0आई0एस0एफ0 ने सराहनीय एवं महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 1991 का वह समय था जब नरसिंह राव सरकार विश्व बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के निर्देशन में देश में निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियाँ लागू कर रही थी। साथ ही दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों की प्रबल पैरोकार भा0ज0पा0 भी राम जन्मभूमि के अपने प्रतिक्रियावादी एजेंडे के द्वारा लोगांे का ध्यान भटका कर नई आर्थिक नीतियों को लागू करवाने में सहायक की भूमिका अदा कर रही थी। ऐसी स्थिति में ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने वाम जनवादी शक्तियों के साथ मिलकर कांग्रेस की नई आर्थिक नीतियों और भा0ज0पा0 के साम्प्रदायिक एजेंडे का एक साथ विरोध किया।
ए0आई0एस0एफ0 का 24वाँ सम्मेलन
7-9 फरवरी 1996 को हैदराबाद में संपन्न हुआ। ए0आई0एस0एफ0 ने दूसरे वामपंथी जनवादी छात्र संगठनों के साथ मिलकर 29 नवम्बर 1995 को अखिल भारतीय हड़ताल करके शिक्षा बचाओ आन्दोलन को आगे बढ़ाया। ए0आई0एस0एफ0 ने 1996 में देशभर में अपनी 60वीं सालगिरह मनाई। ए0आई0एस0एफ0 की छात्राओं ने 1998 में उड़ीसा में धरना आयोजित किया साथ ही देशभर में प्रतिक्रियावादी ताकतों के नारीवादी विरोधी रुख के खिलाफ कार्यक्रम आयोजित किए। 11 दिसम्बर 1998 को अखिल भारतीय छात्र हड़ताल का आयोजन किया गया।
ए0आई0एस0एफ0 का पच्चीसवाँ सम्मेलन
18-21 अक्टूबर 2000 को जालांधर में आयोजित किया गया था। 2000 विभिन्न मुद्दों पर ए0आई0एस0एफ0 के सक्रिय आंदोलनांे का साल था। तमिलनाडु का शिक्षा
अधिकार दिवस, आसाम का विधानसभा मार्च, कोल्लम का छात्र आन्दोलन, बैंगलोर का फाईन आर्टस छात्र आंदोलन, उड़ीसा बाढ़ राहत अभियान और कई राज्यों के सम्मेलन इस साल की मुख्य घटनाएँ थीं। ए0आई0एस0एफ0 ने 6 जुलाई 2001 को शिक्षा के भगवाकरण के खिलाफ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष प्रदर्शन किया। ए0आई0एस0एफ0 ने 8-16 अगस्त 2001 में अलजीरिया में आयोजित 15 वें छात्र युवा महोत्सव में भाग लिया। ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना के 65 वर्ष पूरे होने पर हैदराबाद में छात्र एवं युवा राष्ट्रीय महोत्सव का सफल आयोजन किया। बिहार ए0आई0एस0एफ0 ने शिक्षा बोर्ड में भ्रष्टाचार और फीस वृद्धि के खिलाफ विधानसभा का घेराव किया। महाराष्ट्र एस0एफ0 ने भी छात्रांे की विभिन्न समस्याओं को लेकर अक्टूबर 2002 में विधानसभा का घेराव किया। कुछ छात्र विरोध स्वरूप दर्शक दीर्घा से विधानसभा गैलरी में कूद गए। 29 नवम्बर 2002 को ए0आई0एस0एफ0 ने संसद चलो का नारा दिया जिसमें बड़ी संख्या में देशभर से छात्रों ने भाग लिया। केरल ए0आई0एस0एफ0 ने भी छात्रों की विभिन्न समस्याआंे को लेकर 2003 में विधानसभा का घेराव किया। पुलिस ने छात्रांे पर लाठीचार्ज किया और बड़ी संख्या में छात्रों को जेल में भी डाल दिया।
ए0आई0एस0एफ0 का छब्बीसवाँ सम्मेलन
छब्बीसवाँ सम्मेलन 3-6 जनवरी 2006 को चेन्नई में हुआ और सत्ताईसवाँ सम्मेलन 13-15 फरवरी 2010 को पंाडेचेरी में संपन्न हुआ। सम्मेलन का नारा था ‘‘शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण बन्द करो‘‘। 24 राज्यों के लगभग 1000 प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में हिस्सा लिया। सम्मेलन में ‘‘ भारत में शिक्षा व्यवस्था का संकट‘‘ विषय पर एक सेमिनार का आयोजन भी किया गया जिसे सांसद व भा0क0पा0 राष्ट्रीय सचिव डी0 राजा और प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सदगोपालन ने संबोधित किया।
अब ए0आई0एस0एफ0 अपने 75 वर्षांे के गौरवशाली इतिहास को याद करने और भविष्य की चुनौतियों से संघर्षो की तैयारी करने के लिए 12-13 अगस्त 2011 को फिर से लखनऊ के उसी सर गंगा राम मेमोरियल हाॅल में अपनी 75वीं जयन्ती मनाने के लिए एकत्रित हो रहा है जहाँ 1936 में इसकी स्थापना हुई थी।
समाप्त

मुगल इतिहास का पन्नाः पिंजौर लेख - दौलत भारती

महाभारत कालीन पिंजौर न केबल उस युग के किस्से ओर प्रमाण समेटे हुए है वल्कि मुगलसलतन की धरोहरें भी इस स्थल के ऐतिहासिक होने की पुष्टि करती हैं। गार्डन ही नहीं अपितु यहां का भीमा देवी मंदिर और पिंजौर की बावडियां भी इतिहास की गवाह हैं। कभी पंचपुर नाम से पहचान रखने वाले वर्तमान पिंजौर का उत्तर भारत का बृंदावन होने का दर्जा भी प्राप्त है। 
हरियाणा यूं भी अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए बिख्यात है । महाभारतकालीन विभिन्न घटनाओं का साक्षी हरियाणा उस युग से कई धरोहरों को अब भी संजोए हुए है। शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में बसे क्षेत्र सिंधु घाटी की सभ्यता स ेअब तक के इतिहास के ऐसे पन्ने हैं जो न केवल पुरातन भारतीय संस्कृति का आईना है अपितु आज भी ये स्थल आगुंतकों का अभिभूत करते हैं। चंडीगढ़ शिमला मार्ग पर अविस्थित पिंजौर भी सदियों पुरानी यादों को समेटे आज भी महाभारत कालीन और मुगल सलतनत की यादों का तरोताजा करता है। इतिहास के गबाह पिंजौर के बारे में बता रहे हैं दौलत भारती
सर्दियों में पहाड़ों में जब बर्फ पड़ती है और गर्मियों में मैदानी इलाकों में तपिश बेहाल करती है तो देश भर के सैलानी सकून प्राप्त करने के लिए हिमाचल की वादियों की ओर रूख करते हैं। यदि शिमला हो कर हिमाचल की ओर जाना हुआ तो चंडीगढ़ से मात्र 25 किमी की दूरी पर यादविंद्रा गार्डन पिंजौर कुछ पल रूकने के लिए एक अच्छी सैरगाह है। यूनेस्को की विश्व धरोहर पिंजौर का नजारा देखते ही हर कोई कह उठता है वाह !क्या बात है। शिमला मार्ग पर स्थित पिंजौर महाभारत काल, मुगल शासकों के दौर से गुजरते हुए वर्तमान में हरियाण का प्रमुख पयर्टक स्थल बन चुका है। हालांकि चंडीगढ़ से मात्र 20 किमी की दूरी पर होते हुए भी मुगलकालीन इस पड़ाव की पहचान महज यादविंद्रा पब्लिक गार्डन के रूप में ही है लेकिन कभी पंजपुरा के नाम से बिख्यात वर्तमान पिंजौर को अभी भी वह दर्जा हासिल नहीं हो पाया है जो इसे मिलना चाहिए था।
कुरूक्षेत्र महाभारत के लिए बिख्यात है ..पिंजौर का सम्बन्ध भी महाभारत से जोड़ा जाता है। जनश्रुतियों और मौजूद प्रमाणों के आधार पर कहा जाता है कि पाडंवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम एक वर्ष यहीं व्यतीत किया था और उसी आधार पर इसका नाम पंचपुर पड़ा। पंचपुर ही धीरे-धीरे पिंजौर के नाम से विख्यात हो गया।
ऐतिहासिक संदर्भो तथा हरियाणा पुरात्तव एवं संग्रहालय विभाग के मुताबिक पृथ्वी राज के एक शिलालेख में 1167 ईसवी - विक्रमी संवत 1224 में भी इस स्थल का उल्लेख पंचपुर के नाम से हुआ है।
इस क्षेत्र में एक लाख वर्ष पूर्व प्रयोग किये गये पत्थरों के औजार भी मिले हैं। जो इस क्षेत्र की प्राचीनतम ऐतिहासिक सम्पदा और आदिकालीन मानव सभ्यता के साक्ष्य माने जाते  हैं। 
पिंजौर क्षेत्र में बहुतायत में फैले हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों एवं मंदिरों के अवशेष मिले हैं जो 13वीं शताब्दी तक पिंजौर के एक अन्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल के रूप में विकसित हानेे की बात को पुष्ट करते हैं। इतिहासकार अलबरूनी के1030 ई के विवरण से भी यह बात प्रमाधित होती है। 
पिंजौर से प्राप्त अवशेषों का समृद्व संग्रह पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, हरियाणा के अतिरिक्त, म्यूजजियम एण्ड आर्ट गैलरी, चण्डीगढ़, एवं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग,कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में भी है मौजूद हैं।
इतिहास के पन्नों के अनुसार13वीं शताब्दी के मध्य में विदेशी आक्रमणकारियों ने पिंजौर को भी तहस-नहस कर रख दिया। उसी दौर में यहां के विभिन्न मंदिरों की तोड़-फोड़ का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। 
1254 ई तक पिंजौर सिरमौर के शासक की जागीर था। मिन्हज-पस- सराज नामक तत्कालीन इतिहासकार ने ‘तदकाते नासिरी’ नामक ग्रंथ में उल्लेख किया है कि इल्तुतमिश के पुत्र नसीरूद्दीन महमूद ने 1254 ईस्वी में इस स्थान को सिरमौर के राजा से छीनकर अनेक मंदिर एवं बावडियों को तोड़ा। इसके बाद पिंजौर को1311 मे तैमूर एवं 1507 में चंगेज खां के आक्रमणों को भी झेलना पड़ा जिससे यहां की कई ऐतिहासिक धरोहरें नेस्तनावूद हो गई। 
ठतिहास के पन्नों के अनुसार औरंगजेब के शासनकाल के दौरान उसका चचेरा भाई  फदई खां यहां का गवर्नर हुआ। 1661 में, उसने यहां मुगल उद्यान बनाने के लिए अनेक मन्दिरों एवं बावडियों को तोड़ा। इन मन्दिरों के अवशेष, आज भी इस उद्यान  की दिवालों पर मिलते  हैं।  
यह उद्यान, यहां की सबसे प्रसिद्घ जगह है। महाराजा पटियाला यादवेन्द्र सिंह पटियाला के सबसे आखरी राजा थे। उन्हीं की बदौलत ंिपजोर गार्डन का वर्तमान स्वरूप हर किसी को अपनी ओर आकृष्ट करता है। यह उद्यान, अब उन्हीं के नाम से जाना जाता है। इस उद्यान के बगल में हरियाणा पर्यटन का विभाग बजरीगर मोटेल है।यहां पर घूमने के लिये, इस उद्यान के अतिरिक्त भीमा देवी का मंदिर एवं संग्रहालय है।  
यादविंद्रा गार्डन्स, हरियाणा टूरिज्म को 1966 में मिला। लगभग 50 एकड जमीन पर बिछे खूबसूरत संगीतमय गार्डन की  सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस संगीतमय बाग की नींव संगीत से नफरत करने वाले सम्राट औरंगजेब के माध्यम से पडी थी। सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्द्घ में लाहौर पर औरंगजेब ने विजय हासिल की। फतह का प्रतीक स्मारक बनाकर सेनापति व पंजाब के सूबेदार, रिश्ते में बादशाह के दूर के भाई नवाब फिदाई खां जब दिल्ली वापस लौटे तो औरंगजेब ने उपहार स्वरूप शिवालिक पहाडियों में बसा जंगलनुमा गांव पंचपुरा;पिंजौरद्ध उनके नाम कर दिया। फिदाई खां वास्तुकार होने के साथ-साथ दार्शनिक भी थे सो जंगल में बहार लाने का श्रेय फिदई को जाता है। उन्होंने जंगल को मनमोहक मनोरम स्थल में बदल दिया। बे कुछ बरस यहां रूके। कहा जाता है कि बादशाह औरंगजेब की बेगमें भी यहां आकर रहतीं। तत्कालीन रियासत सिरमौर के महाराज से फिदाई के टकराव के चलते 1675 ई. में इस क्षेत्र पर सिरमौर रियासत ने फिर सेे कब्जा कर लिया था । इस दौरान बरसों तक यह जगह पर बिरान और उजडी रही और यूं वास्तुकार प्रकृति प्रेमी फिदाई का ख्वाब भी पतझड हो गया। 
क्हा जाता है कि महाराजा पटियाला ने मौका मिलते ही यह क्षेत्र सिरमौर से अपने नियंत्रण में ले लिया। अपनी शौकीनमिजाजी के लिए बिख्यात महाराजा पटियाला की बदौलत इस जगह की विरानी और सूनापन सज-संवर कर हरा भरा, मनमोहक हो गया। हरियाणा को 1966 में अलग राज्य की हैसियत मिली और पर्यटन विभाग ने इसे पर्यटकीय नजरिये से तैयार किया। फरवरी 1967 से आम जनता इस जगह की लाजवाब खूबसूरती के दीदार होने लगे। उद्यान का जीर्णोद्वार करवाने वाले महाराजा पटियाला यादविन्द्र सिंह की स्मृति में उद्यान का नाम यादवेन्द्रा गार्डन रखा गया। 
इतिहास का गबाह
ंिपजौर इतिहास का गबाह है । यह क्षेत्र ईसा पूर्व 9वीं से 12वीं शताब्दी के पनपने का साक्षी भी रहा। पुरातत्व पे्रमी पर्यटकों के लिए यहां भीमा देवी मंदिर व धारा मंडल के अवशेष जिज्ञासा जगाते हैं। जहां इस बात के साक्ष्य हैं। प्राचीन संदर्भ है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का आखिरी साल इसी क्षेत्र में बिताया था । जनश्रुति के मुताबिक अपने दुश्मनों की, पानी में विष मिला देने की आशंका के चलते पांडवों ने प्रतिदिन एक नई बावडी खोद कर जल प्रबंध किया था। कहा जाता है कि कभी पिंजौर में 365 बावडियां थीं। विदेशी आक्रमणकारियों ने इन बावडि़यों को तबाह कर दिया लेकिन अभी भी पिंजौर में उस काल की यादे दिलाती कुछेक बावडि़यां मौजूद हैं। किसी युग की याद दिलाती ये बावडि़यां अपनी उपेक्षा की कहानी खुद ही वयां करती हैं। पिंजौर में एक ही स्थान पर निर्मित प्राचीन मंदिर,मस्जिद औेर  गुरूद्वारा इस स्थल में आपसी सदभावना और एकता की मिसाल प्रस्तुत करता है। पिंजोर अविस्थित द्रोपदी की बावड़ी भी इतिहास का एक पन्ना है।
यहां खास है यहां
बैसाखी पर यहां एक महामेला लगता है। बाग के टैरेस के साथ दोनों तरफ आम तथा कुछ अन्य फलों के बगीचे लगे हैं। संभवतया तभी यहां हर बरस जून-जुलाई के महीने में मैंगो फैस्टिवल का आयोजन होता है जिसमें उत्तर भारत में ही नहीं अपितु देश भर में उगाई जाने वाली आम की प्रर्दशनी देखते ही बनती है। आम से बने पकवान आदि इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होते हैं।दिलचस्प बात यह है कि पिंजौर गार्डन में ही- गदा आम होता है जिसके एक ही फल का वजन दो किलो तक भी हो सकता है। यहां आम की अन्य किस्मों के अलावा केले, चीकू, आडू, चीकू, अमरूद, नाशपती, लोकाट, बीज-रहित जामुन, हरा-बादाम व कटहल के काफी पेड हैं। किसी भी मौसम में जाएं, कोई न कोई फल उपलब्ध रहता है। यहां मुगल गार्डन, जापानी बाग, प्लांट नर्सरी के साथ-साथ मोटेल गोल्डन ओरिएंट रेस्तरां, शाॅपिंग आर्केड, मिनी चिडियाघर, ऊंट की सवारी, व्यू गैलरी, कांफ्रेंस रूम, बच्चों के मनोरंजन के लिए विभिन्न गतिबिधियों का भी इंतजाम  है। राजसी महलनुमा गार्डन के प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते ही यहां आकर मुगलकालीन विरासत का अहसास होता है। गर्मियों की शाम और सर्दियों की धूप गार्डन के भीतर दूर दूर तक मखमली घास, फब्बारों से फुटती फुहारे, प्रकृति का एकांत । सचमुच ऐसी जन्नत और कहां । यहां गुजारे कुल पल हर किसी को थकान मुक्त करते हैं और सकून ऐसा कि दिलो दिमाग तरोताजा हो जाए। लेकिन प्रबेश की मंहगी टिकटें,बच्चों के मंनोरजन आदि के विभिन्न कार्नर तथा खानपान आदि का बेहद मंहगा होना तथा खानपान की चीजों के दामों पर अंकुश न होना जरूर यहां आए पर्यटकों को थोड़ा सा निराश करता है। पिंजौर के आसपास बन्य सरंक्षण स्थलियंा भी देखी जा सकती है। लेकिन प्रचार प्रसार की कमी के कारण ये सैलानियों की नजरों से दूर रहती है। वन वनस्पति, वन्यप्राणियों के अनुसंधानकर्ताओं और  शोधार्थियों के लिए भी आसपास बहुत कुछ है। हरियाणा सरकार इस स्थल पर अत्याधुनिक होटल प्रबंधन संस्थान की स्थापना भी करने जा रही है। आसपास ही एक गि( संरक्षण केंद्र स्थापित है। हिमाचल, या चंडीगढ़ आना हो तो पिंजौर देखना न भूलें।
पिंजौर गार्डप पंहुचना बेहद आसान हैं। चंडीगढ़ से शिमला मार्ग पर महज आधा-पौने घंटे की दूरी पर पिंजौर है । शिमला से लौटते हुए या जाते हुए मुख्य मार्ग पर यह स्थल परवाणू, कालका से आगे है। मनाली से लौटना हो तो आप स्वारघाट,नालागढ़, बददी हो कर भी ंिपजौर पंहुच सकते हैं। कालका रेलवे स्टेश्न से पिंजौर गार्डन महज तीन किमी की दूरी पर है। देहरादून, हरिद्वार,नाहन आदि होकर भी यहां आसानी से पंहुचा जा सकता है। यहां ठहरने के लिए हरियाणा पर्यटन विभाग सहित कई नीजि होटल आदि भी उपलब्ध हैं।

सतलुज नदी

सतलुज नदी    : इस नदी का प्राचीनतम नाम "शुतुद्रि" है ! इसकी उत्पति तिब्बत में होती है! सतलुज नदी मानसरोवर झील के पास रक्ष्ताल से उत्पन होती है ! मानसरोवर झील , तिब्बत में केलाश पर्वत के दक्षिण में है !४०० कि ० मी ० बहने के बाद ये शिपकी (किन्नौर) से हिमाचल में प्रवेश करती है ! शिपकी में जांसकर पर्वत श्रृंखला को काटती है ! सतलुज नदी किन्नौर, रामपुर (शिमला) कुल्लू ,सोलन मंडी और बिलासपुर में बहती है ! यह दक्षिण - पश्चिम कि तरफ बहती है !यह भाखड़ा गाँव (बिलासपुर) में पंजाब में प्रवेश करती है !इसकी सहयाक नदिया बासपा, स्पीती ,नोगली खड्ड और स्वां है ! बासपा, सतलुज से करचम (किन्नौर) में मिलती है नोगली खड्ड रामपुर बुशहर के पास सतलुज में मिलती है ! सतलुज कस स्त्रवण क्षेत्र २०००० वर्ग किलोमीटर है ! इसकी कुल लम्बाई १,४५० किलोमीटर है ! यह प्रदेश कि सबसे लम्बी नदी है !इस पैर एशिया का सबसे ऊँचा बांध ( भाखड़ा ) बनाया गया है ! भाखड़ा बांध बनाने से प्रदेश सी सबसे बड़ी कृत्रिम झील, गोविन्द सागर झील बनी है ! १९६४ में इस नदी पर एशिया का सबसे ऊँचा पुल कन्द्रौर नामक स्थान पर बनाया गया है ! इस पुल कि लम्बाई २८० मीटर ऊंचाई ८० मीटर और ७ मीटर चौड़ा है !

Vande Mataram/Matarm - Lata Mangeshkar



Reita Faria


The first Indian woman to became Miss World is

Reita Faria

Shaheed Nayak Satish Kumar Verma

शुभकामना


15 अगस्त अर्थात आजादी का दिवस

सभी देशवासिओं को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामना

MONSOON

MONSOON KI SHUBH KAMNA !!!!!

एक पत्र सरकार और पुलिस के नाम


सेवा में
पुलिस अधीक्षक सतर्कता
मण्डी
जिला मण्डी 175001 हि0प्र0

विषय-                  मनरेगा के तहत रोजगार देने बारे और फर्जी मस्ट््रोल भरने बारे और फर्जी    
              हस्ताक्षर  होने की जांच बारे प्रार्थना पत्र।

महोदय,
              सादर निवेदन है कि मैं रमेश कुमार पुत्र ब्रेस्तु राम गांव पेकवा धार डाकघर तेबन तहसील करसोग जिला मण्डी हि0प्र0 का स्थाई निवासी हू। मैं एक गरीब परिवार BPL से सम्बधित हू। मैं मनरेगा के तहत 100 दिनों के रोजगार के तहत कार्य करना चाहता हूं। मुझे ग्राम पंचायत तेबन ने 17अप्रेल 2009 को जाब कार्ड दिया जिसका क्रमांक 257 है।परन्तु यह जाब कार्ड 22 अक्तूबर 2007 का बना हुआ है ।जब यह जाब कार्ड मुझे दिया गया तो मुझे यह जान कर आश्चर्य हुआ कि इस जाब कार्ड में पहले से ही 1 अप्रेल 2007 से 15 अप्रेल 2007 और 16 नवम्बर 2007 से 30 नवम्बर 2007 तक 15  15 दिनों की हाजरियां दर्शाई गई थी।जबकि इस अवधि में हमने कोई कार्य नहीं किया।  इस कारण से हमें कम से कम दो वर्षो तक मनरेगा के तहत रोजगार से वंचित रहना पड़ा।
              यह सारा कृत्य ग्राम पंचायत तेबन के प्रधान, सचिव और वार्ड सदस्य ने मिल कर किया है। इस सारे कृत्य की जांच उपमण्डल अधिकारी नागरिक करसोग, खण्ड विकास अधिकारी करसोग द्वारा की गई थी जिसमें प्रधान, सचिव  और वार्ड सदस्य को दोषी करार दिया गया। लेकिन प्रधान और सचिव पर कोई कार्रवाही नहीं की गई और वार्ड सदस्य को निलम्बित कर दिया गया।
              ग्राम पंचायत प्रधान और सचिव ने अन्य 8 से 10 लोगों की फर्जी हाजरियां लगाई है जिसकी जानकारी मुझे RTI  के तहत प्राप्त हुई है। इस तरह यह साफ है कि प्रधान और सचिव ने सरकारी धन का दुरुपयोग किया है जिसके लिए इन  दोनो को निलम्बित किया जाना चाहिए ताकि ये लोग भविष्य में इस तरह के कार्य करें। इस सम्बध में मैंने पहले भी दिनांक 30 सितम्बर 2009 को इस घपले के बारे में आपको पत्र लिखा था। उस पर भी कोई कार्रवाही नहीं हुई।
              अतः आपसे पुनः निवेदन है कि आप इस घपले की जांच करने की कृपा करे और दोषी ठहराये गये प्रधान और सचिव के विरुद्ध कड़ी कार्रवाही की सिफारिश करे ताकि भविष्य में इस तरह के कृत्यों की पुनरावृति हो उपरोक्त मस्ट्र्ोल संख्या 00598-00794 की पूरी छानबीन करे ताकि मेंरे साथ साथ सभी अन्य मजदूरों को न्याय मिल सके।
             सधन्यवाद

भवदीय

दिनांक 25@6@10
करसोग

रमेश कुमार  s/o  ब्र्रेस्तु राम
गांव, पेकवाधार डा0 तेबन
तहसील करसोग
जिला मण्डी हि0प्र0
मोबाईल 98162 08674

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