हिन्दी भाषा को सबसे ज्यादा खतरा अँग्रेजी से है : सुषम बेदी

परिकल्पना ब्लागोत्सव : 

पँजाब के शहर फिरोजपुर में जन्मीं लेखिका सुषम बेदी जी दिल्ली विश्वविद्यालय व पँजाब विश्वविद्यालय के बाद  वर्तमान में न्यूयार्क के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ-साथ लेखन में कार्यरत हैं । अब तक सुषम जी के आठ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं इसके साथ-ही-साथ इनके उपन्यासों के अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं जैसे फ्रेंच,अंग्रेजी,उर्दू,उड़िया,गुजराती व पँजाबी में भी हो चुके हैं lइनकी रचनाएँ विविध प्रतिष्ठित पत्रिकाओं जैसे हंस,धर्मयुग,सारिका व नया ज्ञानोदय में छप चुकी हैं । इनके साहित्यिक योगदान को देखते हुए इन्हें भारतीय साहित्य अकादमी,उत्तर प्रदेश हिन्दी अकादमी इत्यादि की ओर से सम्मानित किया गया है । 

प्रस्तुत है सुषम बेदी  से की गई डॉ.प्रीत अरोड़ा की विशेष बातचीत ….

(1) प्रश्न–आपके लेखन की शुरुवात कैसे और कब हुई और आपका प्ररेणा –स्त्रोत कौन है ?

उत्तर —मुझे लगता है कि मेरा लेखिका होने मेरे में होने या उम्र का वह पड़ाव जब अपने होने के प्रति चेतना जगती है ,उसी क्षण से जुड़ा है .यूँ मेरा बचपन भी वैसा था कि होनहार बच्ची को देख कर कहा जाए कि यह बड़ी होकर डॉक्टर बनेगी .मेरी क्लास टीचर ने मुझे लाइब्रेरी से शरतचंद्र और टैगोर कि इलावा चतुर सेन शास्त्री का वैशाली की नगरवधू जैसे बड़े -बड़े उपन्यास दिलवाए जो मै खाली समय में पढ़ती थी .जब नवी जमात में पहुचीं और एक ओर अंग्रेजी के कवि वर्ड्सवर्थ ,शैली ,बायरन और दूसरी ओर हिंदी के कवियों प्रसाद पंत ,महादेवी ,निराला ,दिनकर ,माखनलाल चतुर्वेदी ,मैथिली शरण गुप्त आदि की कविताएँ क्लास में पढाई गयी तो मन में बहुत उत्साह और भीतर तक जैसे गुदगुदी सी मच गयी थी .मै तभी -तभी तेहरा बरस की पूरी हुई थी .तभी मेरा मैं मुझ में जगा था और मैंने पाया कि मै भी एक कापी मे कविताएँ लिखने लग गयी थी .ये कविताएँ तुकबंदी रही होगी या शायद मन की अस्पष्ट भावनाओं को प्रगट करने के अपरिपक्व प्रयास .यह भी याद है कि आधी छुट्टी मे मन मे भीतर ऐसा कुछ उमड़ -घुमड़ रहा होता कि खाना -पीना भूल कर मैं स्कूल की छत पर कोई अकेला कोना ढ़ूँढ़ अपनी कापी मे लिखने बैठ जाती .दसवी में पहुँचते-पहुँचते एक उपन्यास मन में तैयार हो गया था .किसी पर विश्वास भी नहीं जमता था और डर होता कि कही कोई खिली ही न उड़ा दे कि बड़ी चली उपन्यास लिखने .बहुत छुपा -छुपा के रखती बसते में .तब ख्याल भी न या होगा कि भविष्य मे सचमुच लेखिका बनने के सपने को ही पूरा करुँगी .

(2) प्रश्न–लेखन का आपके जीवन मे क्या महत्व है ?

उत्तर–मुझे लगता है कि मै आजकल लिखते हुए भी लगातार सीख रही हूँ .अपने लेखक मित्रों से या जो लेखक नहीं है .मै अपनी कहानियों भी तो अपने आसपास से उठाती रही हूँ .उसमे भी उन सब का योगदान रहा ही जो मेरे आसपास हैं .कभी कुछ ऐसा भी हुआ कि कुछ लोगों को मेरे लिखने पर आपत्ति हुई लेकिन बहुत सपष्ट रूपरेखाएँ कभी भी ऐसी नहीं थी कि कोई खुद को उसमे फिट कर पाता .मेरी लेखकीय कल्पना ने ही मेरा बचाव किया .लेखन मेरे लिये अब जीवन का पयार्य बन चुका है .मेरे सुखदतम क्षण वही होते हैं जबकि लिख रही होती हूँ.जिस दिन अच्छा लिख लेती हूँ, बहुत प्रसन्न चित रहती हूँ.जब नहीं लिख रही होती तो मन अशांत और उखड़ा रहता है.

(3)प्रश्न–आप किन साहित्यकार से प्रभावित हुई हैं ?

उत्तर–वे सब लेखक जिनको मैं पढ़तीं थी-कामू काफका सात्रर जैसे अस्तित्ववादी या अज्ञेय निमर्ल वर्मा राकेश यादव कमलेश्वर जैसे मध्य वर्ग की निराशाओं और मोहभंग का अकंन करने वाले.यही कुछ थाती मिली थी मुझे.यही सीख अगर भ्रष्टाचार है तो है,अनाचार है तो है,धाधंलेबाजी है तो है,कालाबाजारी है तो है,शरमनाक गरीबी है तो है,उसे हटाया या मिटाया नहीं जा सकता.उसके आगे आम आदमी लाचार है, कुछ नहीं कर सकता. कोई कोशिश करेगा तो वह भी मरेगा . ऐसी लाचारी ही प्रेमचंद के पात्रों में थी .गोदान का होरी हो या कफ़न का घीसू .मोहन राकेश का मलबे का मालिक हो या या एक और जिंदगी क केंद्रीय पातर ,मिस पाल हो या अँधेरे बंद कमरे का हरबंश या नीलिमा ,सभी जैसे निराशा और असहायता के अधेरे बंद कमरों मे घुटते हुए रहने को मजबूर हैं .नियति की बेड़ियों मे बंधे रहने को मजबूर .कमलेश्वर का मॉस का दरिया या निर्मल वर्मा के परिंदे की लतिका या हरिशंकर परसाई का भोलाराम का जीव .हर तरफ बेचारगी का अहसास .इंसान नियति के हाथों या अपने से ज्यादा ताकतवरों के हाथों मार ही खाता है .हर और से इंसानी मजबूरी कि कहानियाँ.यही मेरे समय का ,मेरे चेतन का ,मेरे कोशोर्ये काल का या कहूँ छठे दशक का यथार्थ था .जिन यूरोपीय और अमरीकी लेखकों को पढ़ा जैसे कि कामू ,सात्र ,पिंटर ,बैके आसबरन ,आयनेसको या टेनेसी विलियम्स आदि .उन्होंने भी जीवन की निरथकता ,और हालात के थपेड़ों मे चोट खाते इंसान की लाचारगी को ही रेखांकित किया . मतलब कि अपने समाज की अलोचना उसकी कमजोरियों का परदाफाश यानि कि इस नजरिये का विकास– यह सब इन का असर रहा होगा.

(4) प्रश्न–आप किन महिला रचनाकारों के लेखन से अत्यधिक प्रभावित हुई हैं ?

उत्तर–कृष्णा सोबती के लेखन से मैं बहुत प्रभावित हुई हूँ.उन्होंने बहुत पहले से औरत की जरूरतों ,उसकी आशा,आंकाक्षाओं के कहानियों के केन्द्र में रखा है.वे सहज नारी की हमदर्द लेखिका हैं. राजी सेठ के लेखन की बारीकी भी मुझे परभावित करती है.

(5) प्रश्न—–आपको साहित्य की कौनसी विधा सर्वाधिक प्रिय है ?

उत्तर—मेरे लिए साहित्य की निकटतम विधा कहानी ही है .कहानी कहने और सुनने में जो एक आदिम तृप्ति है वह मुझे बहुत मोह लेती है . बचपन में मुझे कहानियाँ सुनने का बहुत शौक था. खूब किताबें पढती थी. अब भी दुनिया भर के लेखकों की कहानियां पढने में सुख मिलता है. यूं जितना चाहती हूं उतना पढ नहीं पाती. कहानी या उपन्यास जो कि मेरे लिये पूरा जीवन समेटनेवाली या कहूं कि एक बडे फलक पर लिखी हुई कहानी ही है, हमेशा मेरे लिये बहुत आकर्षक रही है.

(6) प्रश्न- अपने कालेज के बीते दिनों के बारे मे कुछ बताये ?

उत्तर–कालेज की उम्र में आपकी सहेलियां ही आपके जीवन का केन्द्र होती हैं. मेरे साथ भी ऐसा ही रहा.साधना गीता के साथ इंदरपरसथ कालेज मे हम लोग ताजा पढी कहानियों का चर्चा करते. इंदु जैन हमको पढाती थीं. उनका हुकम होता कि फलां अंतरकालेज प्रतियोगिता मे जाना है और रात रात बैठ मैं कहानी खतम करती. पर हम हर बार इनाम जीतकर ही लाते. कमला नेहरु, जहां मैं पढाती थी, वहां भी मीरा सीकरी और मधु कोहली के साथ नया छपा हुआ पढना ,उसकी बातचीत करते रहना, लगा रहता था. सारिका, नयी कहानी इत्यादि मे जो कहानियाँ छपती ,या धर्मयुग में जो नए स्वर छपते उनको हम सबने पढ़ा होता और क्लासों से ज्यों ही बीच में कुछ खाली वक्त मिलता तो कालेज कैंटीन में चाय का प्याला या कोक ,थमसअप लेकर हम बेताबी से पढ़ी हुई कहानी की चर्चा शुरू कर देते .जिंदगी में उससे ज्यादा महत्वपूर्ण जैसे कुछ था ही नहीं .मुझे याद है मारकंडेय द्वारा सम्पादित माया का कहानी विशेषांक निकला था जिसमें श्रीकान्त वर्मा की कहानी घर पढ़ी थी.ऐसी जबरदस्त थी वह कहानी कि कई दिनों तक चर्चा चलती रही .हमारा सारा समय पढ़ने या तफरीह में ही निकल जाता.लिखने की बात करते पर लिखने की फुर्सत किसी को न होती.

(7) प्रश्न–सुषम जी ये हमारे लिए गौरव की बात है कि आपने हमारे शहर चण्डीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय से पी.एचडी की ड़िग्री प्राप्त कर यहाँ अध्यापन-कार्य भी किया.तो इस दौरान आपको हिन्दी-विभाग के किन-किन गणमान्य व्यक्तियों का सहयोग प्राप्त हुआ ?

उत्तर—उन दिनों ड़ॉ इंदरनाथ मदान विभागाध्यक्ष थे. उनके सुपरिवजन में ही पीएच डी की । मैं ड़ॉ वीरेंद्र मेंहदीरता के साथ दफतर शेयर करती थी. उनसे मेरी बहुत अच्छी मित्रता हुई जो आज तक मौजूद है. जिन दिनों पीएच डी के लिये शोध कर रही थी, मेरे गाइड डा मदान थे पर डा मेंहदीरता से बहुत कुछ सीखा. हम लोग आपस में रंगमंच की बहुत बातें किया करते थे. वे चाहते थे कि मैं उनके दवारा निर्देशित नाटक “लहरों के राजहंस में सुंदरी की भूमिका करुं पर फिर मुझे बरसलस के लिये रवाना होना पडा. उनके दवारा सथापित अभिवयकति संस्था मे कई बार मैंने कहानियाँ पढी. वही रमेश बतरा और सुरेश सेठ आदि से मुलाकात हुई. मैथिली प्रसाद भारद्धाज भी वहीं यूनिवर्सिटी में थे उन दिनों , धरमपाल मैनी तो बाद में आये थे जब थीसिस जमा कराने गयी थी.

(8) प्रश्न—यघपि आप पंजाब विश्वविद्यालय में एक सम्मानजनक पद पर अधीनस्थ थीं तथापि आपने इस पद को त्यागकर विदेश – प्रस्थान का विचार क्यों अपनाया ?

उत्तर– मेरे पति का तबादला बरसऴस , बेलिजयम हो गया था सो मुझे जाना ही था. मै तब शादीशुदा थी . दो बच्चों की मां बन चुकी थी। पति से देर तक दूर रहने का सोच भी नहीं सकती थी. उम्र का यह दौर एसा होता है कि तब परिवार सबसे ज्यादा अहम हो जाता है. यूँ परिवार अब भी अहम है पर तब बच्चों को मां की जरूरत रहती थी. अब नहीं. अब मुझको उनकी जरूरत महसूस होती है. भावनात्मक स्तर पर.

(9) प्रश्न –विदेश में हिन्दी भाषा का अध्यापन करते समय आपको किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ?

उत्तर —यहां तो सब कुछ जीरो से शुरू करना था. खुद भी भाषा पढाना सीखना था. उत्साह था सो सब कुछ कर पायी. मुश्किल नहीं लगा था. आनंद आता था. कुछ करने की तसल्ली भी मिलती थी. मैने भाषा सिखाने की विधियों के कोर्स लिये, अनुभव से सीखा और अमरीकी कौसिल आन द टीचिंग आफ फारन लैनगवेजेस के साथ सालों जुडी रही. अनके भाषा सिखाने के तरीकों को सीखा और अब अमरीका मे हिन्दी के अध्यापकों को सिखा रही हूँ। हर साल बाकायदा उनको पशिकशण देती हूं.

(10) प्रश्न–आप पंजाब विश्वविद्यालय व दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन करने के उपरान्त अब कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अध्यापनरत हैं.तो तीनों विश्वविद्यालयों के अध्यापन-कार्य में आपका सबसे अच्छा अनुभव कहाँ रहा है?

उत्तर—सबसे अच्छा अनुभव कोलम्बिया में ही रहा. यहां मेरा अलग दफतर था. कोरसों के लिए क्या किताबें चुननी हैं, सब में मेरा अपना चुनाव था. हां शुरू मे साहित्य कम पढा पाने का कष्ट होता है. पर भाषा पढाने का भी सुख तो है. खास तौर से जब भाषा से एकदम अनजान छात्र धीरे धीरे बोलने, लिखने और पढने लगते हैं तो मन को बहुत तसल्ली मिलती है. जो सीखते – सीखते साहित्य पढने लग जाते वे छात्र मुझे बहुत परिय हो जाते है. उनको मैं भूलती भी नहीं. मेरी साहित्य की क्लास के विद्यार्थी मुझे हमेशा बहुत प्रिय रहे हैं. वे हमेशा मेरे लिये खास बने रहते हैं। ये लोग होते भी बहुत कमिटेड हैं साहित्य के प्रति , पढ़ाई के प्रति

(11) प्रश्न–इन तीनों जगह पर आपको हिन्दी-भाषा की स्थिति कैसी लगी ?

उत्तर–हिन्दी भाषा की स्थिति तो भारत मे ही सबसे बेहतर होनी चाहिए .मुझे पंजाब यूनिवर्सिटी मे एम ए के छात्रों को पढ़ाना था. थीसिस का काम भी करवाया. दिल्ली में तो बीए के छात्र थे. कोलम्बिया में दोनों तरह के. पर यहां कालेज के विद्यार्थियों को हिन्दी शुरु से सिखानी होती है . अधिकतर विद्यार्थी माध्यमिक स्तर से आगे नहीं बढते. यहां सिखानी मूलत: भाषा होती है, साहितय नहीं. साहितय तो अपने शौक के मारे सिखाती हूँ

(12) प्रश्न–विदेश में भी रहकर आप हिन्दी भाषा और सँस्कृति से कैसे जुड़ी रहीं ?

उत्तर—अपनी भाषा और सँस्कृति से जुड़ा रहना मेरे लिए सहज था.मैं भारत में हिन्दी साहित्य की लेक्चरर थी,लिखती भी थी.वही काम और शौक विदेश आकर जारी रखें.मुश्किल जरूर था.अक्सर फिजूल कर्म भी लगा लेकिन अंततः यही मेरे लिए सुखद और आत्मतोष देने वाला था.भाषा सीखाने में आंनद आता था.खासकर जब विधार्थी सीखकर भाषा का इस्तेमाल करने लगते हैं.बहुत सुख मिलता है.खुशकिस्मत हूँ कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का पद भी मिला.इस तरह शौक और काम दोनों का मकसद एक ही हो गया.हाँ लेखन से जुड़ा रहना मेरा अपना चुनाव था और अंदरूनी जरूरत भी.

(13) प्रश्न–हिन्दी के साथ-साथ आप कौन-कौन- सी अन्य भाषाओं का भी ज्ञान रखती हैं ?

उत्तर—पंजाबी, फ्रेंच,अंग्रेज़ी , कुछ गुजराती सीखी थी एम ए में सँस्कृत भी सीखती रही. ब्रज , अवधी कालेज मे सीखी अगर इनको अलग मानें तो?

(14) प्रश्न —आज हिन्दी भाषा को खतरा किस बात से है ?

उत्तर—-हिन्दी भाषा को ही नहीं आज विश्व की सभी भाषाओं को अंग्रेजी से खतरा पैदा हो गया है.यूरोप की जो भाषाएँ जैसे कि फ्रेंच,जर्मन,अंग्रेजी से ज्यादा महत्व रखती थी वे भी विश्व के नक्शे पर गौण होती जा रही हैं लेकिन यह खतरा व्यवसायिक जगत में ज्यादा है.जहाँ कि अंग्रेजी का बोलबाला है अगर हिन्दी भाषाभाषी अपनी भाषा का दामन स्वयं पकड़े रहेंगे तो भाषा जीवित रहेगी अगर हिन्दी भाषियों ने ही अंग्रेजी को अपनाकर हिन्दी को दोयम दर्जा दे दिया तो उसका उद्धार आसान नहीं होगा. यूं तो हिंदी को भी बाजार मे जगह मिली हुइ है. अगर हम इस बात के लिये सजग रहें कि साहितय की जोत हमें जलाये रखनी है तो हिंदी का लेखक व पाठक मिलकर यह काम भी कर सकते हैं और हिंदी अपने आप को खतरों से बचाये रख सकती है. पर आसान नहीं होगा ये.

(15) प्रश्न–अपनी रचना –प्रक्रिया के बारे में बताएँ?

उत्तर–औरत के लिए घर ही सबसे जयादा महत्वपूर्ण होता है और घर के कामों , रिश्तेदारों को निभाना ,उनके लेखन को बहुत पीछे धकेल देता है .मेरी भी यह कहने की हिम्मत नहीं होती थी कि मुझे लिखना है .ज्यादातर इधर -इधर से समय चुराकर ही लिखा करती थी मैं.पर अब अगर खाना न बना पाँऊ तो यह कहने की हिम्मत तो रखती हूँ कि आज लिखने का मूड़ बना हुआ था,या कुछ पूरा करना था. मैंने अपनी रचना प्रक्रिया पर सृजन की देहरी पर नाम से लेख लिखा है. मेरी निबन्धों की किताब समसामयिक प्रकाशन से आ रही है जुलाई में. उसमे वह लेख है.

(16) प्रश्न–सुषम जी आपका पहला उपन्यास ‘हवन’ जोकि उर्दू व अंग्रेजी में अनुवादित हो चुका है.क्या आप इसे अन्य भाषाओं में जैसे पंजाबी,मराठी इत्यादि में भी अनुवादित करवाने की इच्छा रखती हैं ? पर मुझे मालूम नहीं कि किसकी रूचि होगी अनुवाद करने में.

उत्तर– मुझे तो अच्छा ही लगेगा अगर इसका ज्यादा से ज्यादा भाषाओं में अनुवाद हो और लोगों तक पहुंचे.

(17) प्रश्न– हवन उपन्यास की गुड़्ड़ों जोकि विधवा है ,और भारतीय परिवेश में पली बढ़ी है.तो विदेश में जाने के बाद उसे भारतीय सँस्कृति व सभ्यता को कायम रखने में कौन-कौन -सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ?

उत्तर– गुडडो के संघर्ष तो हवन को पढकर ही जानने होंगे

(18) प्रश्न—-जैसाकि आपका उपन्यास मोरचे आपकी भाँजी के सँघर्षमयी जीवन की व्यथा-गाथा है.लेकिन अब आपकी भाँजी नारी-सशक्तीकरण की मिसाल है तो क्या अब आप मोरचे का दूसरा-भाग लिखना चाहेंगीं ,जिसमें आपकी भाँजी उर्फ नायिका का सबल व सशक्त रूप उभर कर सामने आए ?

उत्तर— उपन्यास तो जो मन मे बनता है उसी को लिखती हूं. वैसे भी सफलता की कहानियाँ एक सी होती है विविधता दुख और पीड़ा मे होती है. शायद ताऴसताय ने कहा है न.

(19) प्रश्न— ‘मैंने नाता तोड़ा ‘ आपका बहुचर्चित उपन्यास है इसकी कथा-वस्तु मुख्य रूप से समाज की किस समस्या की ओर इशारा करती है ?

उत्तर —भारत मे ही नहीं दुनिया भर में औरत के शरीर को लेकर उसे हर तरह से सहना पडा है. घर में अपने ही चाचे-मामे लोभ संवरण नहीं कर पाते. हर घर में ऐसी कहानियाँ सुनती रही हूं. अमरीका मे तो सौतेला बाप भी लडकी का दुश्मन होता है. घर घर की कहानी यही है पर लोग छुपाते फिरते हैं. इसी से इस को जाहिर करना जरूरी था.

(20 )प्रश्न–आपकी शीघ्र प्रकाश्य ‘सड़क की लय ‘ कहानी किस तथ्य पर आधारित है ?

उत्तर—सडक की लय कहानी हंस में छप चुकी है. यह कहानी यहां बडी होने वाली लडकी के मानसिक तनावों की परख करती है. यह भी दर्शाती है कि कैसे भारतीय मां-बाप भी कनफयूजड हैं और बेटियों को भी वैसे ही मूलय देते हैं. किताब इस साल सामयिक से आएगी . पर उसका नाम बदल कर “आसमान पर पाव” रखा है जो कि उस संकलन की एक दूसरी कहानी है.

(21) प्रश्न—-सुषम जी स्त्री विमर्श से आपका क्या तात्पर्य है ?

उत्तर–स्त्री विमर्श का सही मतलब स्त्री को समाज के केन्द्र में रखना है. जब तक पुरुषों को केन्द्र में रख समाज के सारे कार्यकलापों ,संस्थाओं का संगठन हुआ है.जरूरी है अब औरत को समाज की उतना ही जरूरी इकाई मानकर समाज की चर्चा हो.स्वास्थ्य की बात हो तो स्त्री का स्वास्थ्य समस्यानुशीलन के केन्द्र में हो.स्त्री का महत्व कायम हो.

(22) प्रश्न–नारी की मुक्ति किससे है ?

उत्तर–सहीं अर्थों में नारी की मुक्ति के बीज उसके भीतर ही हैं.कोई औरत को मुक्त नहीं कर सकता जबतक कि औरत खुद को आजाद नहीं करना चाहेगी.इसलिए औरत को अपनी खुदी को बुलंद करना होगा.अगर वह स्वतंत्र ,आत्मनिर्भर होना चाहेगी और यह जब उसके भीतर की जरूरत बन जायेगी तो फिर चाहे लड़ाई करनी पड़े पर रूकावटें अपने आप हटती जायेगी उसके रास्ते से.सच यह है कि औरत अभी तक इस बात को समझ नहीं पायी है .सदियों की दासता ने उसकी आत्मा को परनिर्भरता सीखा दी है.आजादी से उसे ड़र लगता है क्योंकि आजादी अपनी कीमत भी तो माँगती है .आजाद व्यक्ति अकेला भी पड़ सकता है .औरत को अपने भीतर इन स्थितियों से मुकाबला करने की हिम्मत जुटानी होगी.

(23) प्रश्न—आप मूलतः पंजाब से है.क्या विदेश में रहकर आपको पँजाब की कमी महसूस होती है ?

उत्तर—वह तो सहज ही है पर मेरा कालेज बीए, एम ए, एम फिल दिल्ली यूनिवर्सिटी से हुआ था, पढाया भी वहां छह साल सो ज्यादा लगाव दिल्ली से है. उसी की याद ज्यादा आती है

(24) प्रश्न—-आजकल विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों द्वारा आपके साहित्य पर शोध-कार्य किए जा रहें हैं.तो आप कैसा महसूस कर रही हैं ?

उत्तर—वह अच्छी बात है कि इस ओर ध्यान दिया जा रहा है. पर इस बात की कमी खलती है कि आलोचना जगत में उसका कोई चर्चा नहीं। समझ नहीं आता कि इसकी क्या वजह हो सकती है? शायद आप लोगों के पास इसका जवाब हो?

(25) प्रश्न—सुषम जी आप नवयुवकों को क्या संदेश देना चाहेंगीं ?

उत्तर—संदेश बस यही है कि लेखन तभी करो अगर लेखन के बिना जीना अर्थहीन लगे – धन या नाम के लिए नहीं.एक बार प्रतिबद्ध हो जाओ लेखन के प्रति पूरी ईमानदारी से लिखो .जल्दबाजी में लिखा कभी दूर तक नहीं जाता .जो लिखा है उसका आकलन खुद करो और लगे कि तुमने अपना श्रेष्ठतम दिया है तभी उसे छपने के लिए भेजो.एक और बात जो मैंने दूसरों से सीखी वह यह भी कि लिखने से ही हाथ खुलता है बेहतर लिखा जाता है.लिखने से ड़रने की भी जरूरत नहीं.पर वहीँ इस बात का भी ध्यान रखना है कि क्या न लिखा जाए .लेखन में चुनाव की बहुत अहमियत है।

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साक्षातकर्ता – डॉ प्रीत अरोड़ा

जन्म – २७ जनवरी. शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनों वर्षों में प्रथम स्थान के साथ और मृदुला गर्ग के कथा-साहित्य में नारी-विमर्श पर शोध-कार्य . कार्यक्षेत्र-. अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद।

रवीन्द्र प्रभात जी का isahitya द्वारा लिए गए एक खास इंटरव्यू

रवीन्द्र प्रभात , हिन्दी साहित्य में एक एसे साहित्यकार हैं जिन्होंने साहित्यक ब्लॉगस को बड़ी गंभीरता से लिया और ब्लॉग के मुख्य विश्लेषको के रुप में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया । पर रवीन्द्र जी केवल वेब तक सीमित साहित्यकार नहीं हैं । हाल ही उनका दूसरा उपन्यास “ प्रेम न हाट बिकाय” प्रकाशित हुआ हैं जो प्रेम संबंधो पर आधारित हैं । इससे पहले उनका उपन्यास “ ताकि बचा रहे लोकतन्त्र” भी चर्चित रहा । इससे पहले रवीन्द्र जी के दो ग़ज़ल संग्रह और एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं । इन सभी के बीच उनकी लिखी एक खास पुस्तक “ हिन्दी ब्लोगिंग का इतिहास “ जो पिछले वर्ष प्रकाशित हुयी भी एक महत्वपूर्ण पुस्तक हैं जो हिन्दी साहित्य तथा ब्लॉग के जुड़ाव के इतिहास की रोचक कहानी हैं ।
ब्लॉग श्री और ब्लॉग भूषण सम्मानित तथा परिकल्पना वेब पत्रिका के संपादक रवीन्द्र प्रभात से उनके लेखन , उनके “ प्रेम न हाट बिकाय”  नए उपन्यास और कई पहलुओ पर isahitya ने उनसे बातचीत की । 
प्रस्तुत हैं रवीन्द्र प्रभात जी का isahitya द्वारा लिया गया एक खास इंटरव्यू । 
प्रश्न - सबसे पहले आप के शब्दों में आपका परिचय जानना चाहेंगे , उनके लिए जो शायद आपसे परचित नहीं हैं । साहित्य में आप का अब तक का सफ़र कैसा रहा ?
रवीद्र प्रभात -  मेरा जन्म  आज से साढ़े चार दशक पूर्व 05 अप्रैल को बिहार के सीतामढ़ी जनपद के एक गाँव महिंदवारा मे एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ । मेरा मूल नाम रवीन्द्र कुमार चौबे है । मेरी आरंभिक शिक्षा सीतामढ़ी में हीं हुई। बाद में मैंने बिहार विश्वविद्यालय से भूगोल विषय के साथ विश्वविद्यालयी शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद पत्रकारिता और मास कम्यूनिकेशन से स्नातकोत्तर भी किया । जीवन और जीविका के बीच तारतम्य स्थापित करने के क्रम में मैंने अध्यापन का कार्य भी किया, पत्रकारिता भी की, वर्त्तमान में ये एक बड़े व्यावसायिक समूह में प्रशासनिक पद पर कार्यरत हूँ। आजकल लखनऊ में हूँ। लखनऊ में ही स्थायी निवास है अपना ।
विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के साथ-साथ वर्ष-1991 में 'हमसफ़र'(ग़ज़ल संग्रह), 1995 में 'समकालीन नेपाली साहित्य'( संपादित), 1999 में 'मत रोना रमज़ानी चाचा' (ग़ज़ल संग्रहप्रकाशित है । प्रारंभिक दिनों में दो पत्रिकाओं क्रमश: 'उर्विजा' और 'फागुनाहट' का संपादन तीन-चार वर्षों तक किया । हिंदी मासिक 'संवाद' तथा 'साहित्यांजलि' का विशेष संपादन से भी जुड़ा । 'ड्वाकरा' की टेली डक्यूमेंटरी फ़िल्म 'नया विहान' के पटकथा लेखन से भी जुड़ा । लगभग दो दर्ज़न सहयोगी संकालनों में रचनाएँ भी संकालित है । वर्ष 2002 में स्मृति शेष काव्य संग्रहकथ्यरूप प्रकाशन इलाहाबाद ने प्रकाशित किया। मैंने लगभग सभी साहित्यिक विधाओं में लेखन किया है परंतु व्यंग्य, कविता और ग़ज़ल लेखन में प्रमुख उपलब्धियाँ रही हैं। मेरे रचनाएँ भारत तथा विदेश से प्रकाशित लगभग सभी प्रमुख हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा कविताएँ कई चर्चित काव्य संकलनों में संकलित की गई हैं। मेरे दो उपन्यास क्रमश: 'ताकि बचा रहे लोकतन्त्र' 2011 में और 'प्रेम न हाट विक़ाए' इसी वर्ष यानि 2012 में हिन्द युग्म प्रकाशन ने प्रकाशित किया है । पहला उपन्यास दलित विमर्श पर होने के कारण काफी चर्चा में रहा। सुप्रसिद्ध आलोचक मुद्राराक्षस जी ने भी उस उपन्यास को काफी सराहा और विमर्श का रूप दिया । ताकि बचा रहे लोकतन्त्र के लिए प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ ने बाबा नागार्जुन जन्मशती कथा सम्मान-२०१२ से मुझे सम्मानित भी किया है ।आजकल मेरा दूसरा उपन्यास प्रेम न हट बिकाय की भी खूब चर्चा है । साहित्य से हटकर मेरी एक पुस्तक  " हिन्दी ब्लोगिंग का इतिहास" हिन्दी साहित्य निकेतन बिजनौर ने प्रकाशित किया है साथ ही विगत वर्ष मैंने हिन्दी ब्लोगिंग की पहली मूल्यांकनपरक पुस्तक " हिन्दी ब्लोगिंग: अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति" का संपादन भी किया है । दैनिक जनसंदेश टाइम्स और डेली न्यूज एक्टिविस्ट में प्रकाशित मेरा व्यंग्य स्तंभ चौबे जी की चौपाल भी काफी चर्चा में है आजकल । वर्तमान में  मैं हिन्दी ब्लोगिंग और साहित्य के बीच सेतु निर्माण करने वाली पत्रिका वटवृक्ष के संपादन से भी जुड़ा हूँ ।
प्रश्न – आपका नए उपन्यास ‘प्रेम ना हाट बिकाय’ जो हाल में हिन्दी युग्म प्रकाशन से प्रकाशित हुआ हैं , इसके बारे में आपसे जानना चाहेंगे ?
रवीद्र प्रभात -  नामानुरूप यह उपन्यास प्रेम की धुरी पर स्थापित दो समांतर प्रेम वृतों की रचना करता है, जिसके एक वृत का केंद्र प्रशांत और स्वाती का प्रेम-प्रसंग है तो दूसरे वृत की धुरी है देव और नगीना का प्रेम । एक की परिधि सेठ बनवारी लाल और उनकी पत्नी भुलनी देवी है तो दूसरे की परिधि देव की माँ राधा । इन्हीं पात्रों के आसपास उपन्यास का कथानक अपना ताना वाना बुनता है । पूरी तरह से त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग पर आधारित है यह उपन्यास । बस सीधे-सीधे आप यह समझें कि विवाह जैसी संस्था की परिधि में उन्मुक्त प्रेम की तलाश है यह उपन्यास । इसमें कथा की सरसता भी आपको मिलेगी और रोचकता भी । मित्रता, त्याग,प्यार और आदर्श के ताने बाने से इस उपन्यास का कथानक रचा गया है जो पाठकों को एक अलग प्रकार की आनंदानुभूति देने में समर्थ है ।
प्रश्न – ‘प्रेम न हाट बिकाय’ के मुख्य पात्रो की बात करे तो इसके मुख्य नायक और नायिका कौन हैं । क्या आपने पात्र किसी निजी अनुभवो या घटनाओ से प्रभावित होकर अपने उपन्यास में उतारे ।
रवीद्र प्रभात - मेरे इस उपन्यास का मुख्य पात्र प्रशांत और स्वाती है जिनके इर्द-गिर्द उपन्यास से जुड़ी समस्त घटनाएँ करवटें लेती है । प्रशांत ग्रामीण परिवेश मे पला एक निम्न माध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता है जो शादी-शुदा है और स्वाती एक व्यवसायी की पुत्री है जो शहरी परिवेश मे पली बढ़ी है। पूरे उपन्यास मे बनारस की आवोहवा और बनारस की संस्कृति हावी है । मैंने बनारस मे कई बरस गुजारें है इसलिए बनारसी परिवेश को उपन्यास मे उतारने मे मुझे मेरे अनुभवों ने काफी सहयोग किया । जहां तक निजी अनुभवों या घटनाओं से प्रभावित होकर उपन्यास लिखने का प्रश्न है तो ऐसा कुछ भी नहीं है इस उपन्यास के साथ । हाँ इर्द-गिर्द की कुछ शुक्ष्म अनुभूतियाँ है बस ।
प्रश्न - आपकी विवाह उपरांत प्रेम संबंधो पर निजी राय क्या हैं ? क्या आप विवाह उपरांत संबंध को विवादित विषय मानते हैं ? इस उपन्यास के माध्यम से क्या आप कोई विचार लोगो के सामने रखना चाहते थे  ?
रवीन्द्र प्रभात - मेरी राय मे यदि विवाह उपरांत आपसी सहमति से प्रेम संबंध बनते हैं तो गलत नहीं है, क्योंकि हर किसी को अपनी पसंद-नापसंद का अधिकार होना ही चाहिए न कि किसी के थोपे हुये संबंध के निर्वहन मे पूरी ज़िंदगी को नीरसता मे धकेल दिया जाया । हो सकता है मेरे विचारों से आप इत्तेफाक न रखें मगर यही सच है और इस सच को गाहे-बगाहे स्वीकार करना ही होगा समाज को, नहीं तो एक पुरुष प्रधान समाज मे स्त्री की मार्मिक अंतर्वेदना के आख्यान का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, ऐसा मेरा मानना है ।
इस उपन्यास को लिखने की खास वजह यह रही कि प्रेम की स्वतन्त्रता और विवाह जैसी संस्था आदि विवादित विषयों पर नए सिरे से पुन: गंभीर बहस हो ।
प्रश्न - आपके पहले उपन्यास “ ताकि बचा रहे लोकतन्त्र” के बारे भी जानना चाहेंगे ? शीर्षक से एक ज्वलंत विषय पर आधारित प्रतीत होता हैं । इसकी भूमिका और इसके लिखने पीछे आपके विचार जानना चाहेंगे ।
रवीन्द्र प्रभात - यह एक घटना प्रधान उपन्यास है। उपन्यास का प्रमुख पात्र है झींगना जो दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है ।  झींगना के चरित्र का विकास चार घटनाओं पर निर्भर है, जो झींगना को झींगना साहब बना देती है। पहली घटना -‘कोटे के हो कभी नही सुधरोगे’। की डांट से नौकरी छोड़कर झींगना द्वारा पुनः मैला ढोने के पारम्परिक कार्य को अपनाना । दूसरी घटना – मुर्दाघर की नौकरी के दौरान नाटक मंडली के मालिक चमनलाल से भेंट और नौकरी छोड़कर कलाकार बनने की झींगना की चेष्टा। तीसरी घटना – बिना टिकट यात्रा के दौरान झींगना की ताहिरा से भेंट और रेडियो, दूरदर्शन और नाटक मंडली का कलाकर बनकर ख्याति और पैसा अर्जित करना। चौथी घटना – इन पैसों से एक सोसाइटी बनाकर गरीबो का उद्धार करते हुये माओवादियों को अहिंसात्मक आंदोलन के रास्ते पर लाने का झींगना का प्रयत्न। इसी के मध्य झींगना और ताहिरा का झीने से आवरण में छुपा एक अनकहा आदर्शवादी प्लूटोनिक प्रेम-प्रसंग अपना प्रस्तार ग्रहण करता है और अन्त में ताहिरा सुरसतिया के मरणोपरान्त उसके बेटे मुन्ना को लेकर लखनऊ लौट आती है। एक मुन्ना में एक नया भविष्य देखती है। यह उपन्यास दलित प्रश्न को सामने लेकर चलता है और समाज को यही संदेश देने का प्रयास करता है कि जबतक समाज मे पूरी तरह समाजवादी व्यवस्था नहीं आती तबतक दलितों में आर्थिक विषमता बनी रहेगी ।
प्रश्न - सामाजिक मुद्दो से जुड़े  उपन्यास की सबसे बड़ी चुनौती इसके उपन्यास का अंत होती हैं क्योंकि उस वक़्त लेखक को पाठको को एक विचार के अंतर्गत बांधना होता हैं ताकि उपन्यास की वैधता बनी रहे । आपकी इस पर क्या राय हैं ?
रवीन्द्र प्रभात - यह सही है कि सामाजिक मुद्दों से जुड़े उपन्यास की बड़ी चुनौती है उसका समापन यानि अंत । मैंने भी अपने दोनों उपन्यासों मे इस चुनौती को स्वीकार किया है । अगर विचार नहीं तो उपन्यास का मतलब क्या ?
प्रश्न -  लेखन तथा साहित्य में आप को आने की प्रेरणा कैसे मिली? शुरुआत से आपको कौन कौन से साहित्यकारों ने हमेशा से प्रभावित किया ?
रवीन्द्र प्रभात - इस संदर्भ में एक वाकया बताना चाहूँगा । बचपन में दोस्तों के बीच शेरो-शायरी के साथ-साथ तुकबंदी करने का शौक था। इंटर की परीक्षा के दौरान हिन्दी विषय की पूरी तैयारी नहीं थी, उत्तीर्ण होना अनिवार्य था।  इसलिए मरता क्या नहीं करता । सोचा क्यों न अपनी तुकवंदी के हुनर को आजमा लिया जाए ।  फिर क्या था राष्ट्रकवि दिनकर, पन्त आदि कवियों की याद आधी-अधूरी कविताओं में अपनी तुकवंदी मिलाते हुए सारे प्रश्नों के उत्तर दे दिए ।  जब परिणाम आया तो अन्य सारे विषयों से ज्यादा अंक हिन्दी में प्राप्त हुए थे ।  फिर क्या था, हिन्दी के प्रति अनुराग बढ़ता गया और धीरे-धीरे यह अनुराग कवि-कर्म में परिवर्तित होता चला गया । गद्य की ओर बहुत बाद में उन्मुख हुआ । वर्ष-1995- 96 में मेरी पहली भोजपुरी कहानी 'रेवाज़' अंजोरिया में प्रकाशित हुयी उसके बाद ।
लेखन के प्रारंभिक दिनों में आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी का भरपूर स्नेह-सान्निध्य प्राप्त हुआ । लेखन में निखार भी उनके बहुमूल्य परामर्श से ही संभव हो सका । उन्होंने महाप्राण निराला को केवल पढ़ने नहीं महसूस करने को कहा । हालांकि मैंने अपने लेखन की शुरुआत गजल से की थी इसलिए मेरी अभिरुचि आचार्य जी के गीतों और गज़लों में ज्यादा थी। उन्हीं दिनों उनका एक गजल संग्रह 'कौन सुने नगमा' भी आया जो मेरी पसंदीदा पुस्तकों में से एक है । प्रमुख ओजकवि पाण्डेय आशुतोष, नवगीतकार हृदेश्वर, श्रीराम दूबे और आलोचक जगदीश बिकल से भी प्रारंभिक दिनों में मेरी बड़ी निकटता रही ।  दुष्यंत और अदम गोंडवी की गज़लों को पढ़कर गजल लिखना शुरू किया तथा  मुक्तिबोध और शमशेर को पढ़कर कविता । प्रेमचंद के साथ-साथ अज्ञेय,रेणु और नागार्जुन के गद्य साहित्य ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया है । मुद्रा जी की भी गद्य रचनाएँ अच्छी लगती है मुझे ।
प्रश्न - आपने साहित्य जीवन की शुरुआत एक गजल संग्रह (हमसफर) के प्रकाशन से की थी फिर आपने एक लंबा अंतराल लेकर एक और गजल संग्रह (मत रोना रमज़ानी चाचा) प्रकाशित की । फिर आपका कविता संग्रह भी आया । आप ग़ज़ल और कविताओ दोनों से जुड़े रहे हैं । हाल ही में इंडिया टुडे  मे एक लेख प्रकाशित हुआ शायरी का जश्न और कविता का मातम  (लिंक ) । आपका का क्या मानना हैं ?
रवीन्द्र प्रभात - यह सच है कि आज हिन्दी कविता का महत्व और स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है, पाठकों से दूरी बढ़ती जा रही है। यथास्थिति की प्रस्तुति और उससे उत्पन्न आक्रोश को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत करने के पश्चात भी आज कविता सुधी-जनों की उपेक्षा से मर्मान्हत है। हर साल अरबों रुपए का सरकारी बजट हजम करने वाली हिंदी भाषा की कविता के कद्रदान लगभग लापता हो चुके हैं।यह भी सही है कि हिंदी कविता अगर सिलेबस में न पढ़ाई जाए तो उसे पूछने वाले कम ही मिलेंगे। हिंदी कविता की किताबें छपती तो हैं पर बिकती कम और बांटी ज्‍यादा जाती हैं। सचमुच यह हिन्दी कविता के लिए अमंगलकारी होने का  स्पष्ट संकेत है।  दूसरी ओर अनेकानेक कवियों का झुकाव ग़ज़लों की ओर हो जाने से कुछ आलोचक दबी जुवान से ही सही, किन्तु ग़ज़ल को काव्य के विकल्प के रुप में देखने लगे हैं ।  इसप्रकार हिन्दी काव्य जगत में ग़ज़ल का विकास तेजी से हो रहा है और संभावनाएं बढ़ गयी है । 
प्रश्न - आज हिंदी साहित्य से लोगों का जुड़ाव कम होता दिखता है हिंदी भाषी होने के बावजूत  लोगों में हिंदी के लिए रुझान कम ही देखने को मिलता है । हमारी युवा पीढ़ी में हिन्दी साहित्य की लोकप्रियता भी कम हैं । आप इसे कैसे देखते हैं ?
रवीन्द्र प्रभात - साहित्य केवल अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि सभ्यता को संस्कारित करने और संस्कृति को शब्द देने का सशक्त प्रयोग है। भाषा के स्तर पर जब लोककथाओं के क़दम आगे बढ़े तो कहानी दिखाई देने लगी और आधुनिक रूप में स्थापित होने के साथ ही भौगोलिक सीमाओं को तोड़कर चारों ओर अपने छींटे बिखेरती नज़र आने लगी । खेत-खलयानों से गुज़रती जमींदारों के शोषण, साहूकारों के अत्याचार, मज़दूरों के आंसुओं का अहसास दिलाती, गांव-नगर, महानगरों में विचरण करती हुई, पारंपरागत आंगन में टीस, कसक, कुण्ठा-शोषण आदि के धरातल पर सुख-दुख के हमसफ़र किरदारों को जीवंतता प्रदान करने लगी। मगर शहरीकरण पर अचानक बाजारवाद के हस्तक्षेप ने पठनीयता को ऐसा कमजोर किया कि हिन्दी साहित्य की आधारशिला अनायाश ही दरकती चली गयी । शहरों में हिन्दी साहित्य से कम लोगों के जुड़ाव के दो कारण है । एक है बाजारवाद जो लगातार हमारी प्रगतिशील सोच को कमजोर करने की दिशा में काम कर रहा है । इससे शहर की सामाजिकता लगातार खंडित हो रही है और सम्बन्धों में एक अलग प्रकार का विघटन उपस्थित हो रहा है। दूसरा है परंपरागत शैली की खोल से साहित्यकारों के बाहर न निकलने की झिझक । यह झिझक हमें हमारे शहरी पाठकों से दूर करता जा रहा है । शहरों में भाषा को लेकर हमारी युवा पीढ़ी लगातार प्रयोग कर रही है। इधर कुछ दिनों में हिंगलिश का प्रचलन ऐसा हुआ है कि हिन्दी साहित्य शहरों में अपने अस्तित्व को लेकर अत्यधिक सशंकित है । 
प्रश्न - आप के विचार से इस बढ़ते फासले को समेटने के लिए  क्या किया जा सकता है ?
रवीन्द्र प्रभात - मेरा मानना है कि हिन्दी साहित्य और उसके साहित्यकार सत्ता के आगे नतशिर होने और पूंछ हिलाने की प्रवृत्ति से पीछा छुड़ायें। हिन्दी भाषा को और सरल रूप देने की दिशा में कार्य करे। हमें  तेज़ी से बादल रहे समय, समाज और सरोकार पर भी नज़र रखने की जरूरत है । हिन्दी भाषा व साहित्य , विशेषकर हिन्दी कविता से सरोकार रखने वाले लोगों के बीच इस बात को लेकर गंभीर विमर्श होना चाहिए कि कैसे आज के तकनीकी युग में शहरों-महानगरों में तब्दील होते कस्बे से अपने जुड़ाव को और मजबूत किया जा सके । जनसरोकारों से जुड़ा हुआ साहित्य आज भी हमारी युवा पीढ़ी को आकर्षित करता है, बशर्ते उन्हें बताने के बजाय साहित्य में पिरोकर महसूस कराया जाये ।
प्रश्न - ब्लॉग और आप, बेहद गहरा और मजबूत नाता हैं आप दोनों का । कैसे शुरुआत हुयी इंटरनेट के माध्यम से हिन्दी ब्लॉगिंग की ?
रवीन्द्र प्रभात - मैंने जब ब्लागिंग मे कदम रखा तो मुझे भी नहीं मालूम था कि इसका भविष्य क्या होगा । मुंबई मे मेरे एक मित्र हैं बसंत आर्य आयकर अधिकारी हैं और हास्य-व्यंग्यकार भी । उन्होने एक दिन मुझे जियोसिटीज़ डॉट कौम पर ब्लॉग बनाने की जानकारी दी । इसपर मैंने भी "एक नयी सुबह की ओर" नाम से ब्लॉग बनाया । इस पर सुविधाएं कम थी, हिन्दी टाईपिंग की व्यवस्था नहीं थी इसलिए मजा नहीं आता था । फिर अंतर्जाल पर भ्रमण के दौरान मुझे ब्लॉग स्पॉट डॉट कौम पर ब्लॉग बनाने की जानकारी हुयी । मैंने परिकल्पना नाम से पहला ब्लॉग बनाया । उस समय सौ के आसपास लोग ही थे ब्लोगिंग मे और सक्रिय ब्लॉगर थे दो-तीन दर्जन के आसपास । धीरे-धीरे लोग बढ़ते गए और कारवां बनाता गया । वर्ष- 2007-2008 मे ब्लॉग पर अनेकानेक प्रतिभाशाली लोगों का आगमन हुआ । इससे यह महसूस होने लगा कि आने वाले समय मे निश्चित रूप से हिन्दी साहित्य को ब्लॉग एक नयी दिशा देंगे ।
प्रश्न - आपकी एक पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास’ पिछले वर्ष प्रकाशित हुई इसके बाद आपने इसी पर आधारित एक और पुस्तक का सम्पादन भी किया । आपकी ये पुस्तक बड़ी विशेष हैं और हिन्दी ब्लॉगस को लेकर एक बेहद रोचक कहानी कहती हैं । हिन्दी ब्लॉगिंग पर पुस्तक लिखने की प्रेरणा कैसे मिली ?
रवीन्द्र प्रभात - हमेशा कुछ नया करने की चाहत नए प्रयोग को जन्म दे देती है । वर्ष-2007 के दिसंबर महीने मे मैंने ब्‍लॉगिंग में एक नया प्रयोग प्रारम्‍भ किया और ‘ब्‍लॉग विश्‍लेषण’ के द्वारा ब्‍लॉग जगत में बिखरे अनमोल मोतियों से पाठकों को परिचित करने का बीड़ा उठाया। 2007 में पद्यात्‍मक रूप में प्रारम्‍भ हुई यह कड़ी 2008 में गद्यात्‍मक हो चली और 11 खण्‍डों के रूप में सामने आई। वर्ष 2009 में मैंने इस विश्‍लेषण को और ज्‍यादा व्‍यापक रूप प्रदान किया और विभिन्‍न प्रकार के वर्गीकरणों के द्वारा 25 खण्‍डों में एक वर्ष के दौरान लिखे जाने वाले प्रमुख ब्‍लागों का लेखा-जोखा प्रस्‍तुत किया। इसी प्रकार वर्ष 2010 में भी यह अनुष्‍ठान मैंने पूरी निष्‍ठा के साथ सम्‍पन्‍न किया और 21 कडियों में ब्‍लॉग जगत की वार्षिक रिपोर्ट को प्रस्‍तुत करके एक तरह से ब्‍लॉग इतिहास लेखन का सूत्रपात किया। यही क्रम वर्ष-2011 मे भी चला । इस विश्लेषण को अपार लोकप्रियता प्राप्त हुयी, पूरे ब्लॉग जगत ने मेरे इस कार्य की सराहना की । पाठकों की इसी सराहना ने मुझे हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास लिखने के लिए प्रेरित किया। इस पुस्तक मे वे सारी चीजें है जो एक युवा और नवोदित ब्लॉगर के ज्ञानार्जन के लिए आवश्यक है ।
प्रश्न - परिकल्पना ब्लोगोत्सव के बारे में बताइये ।  इस तरह के पहलकदमी को लेकर साथी साहित्यकारों के शुरुआती प्रतिक्रियाए क्या रही ?
रवीन्द्र प्रभात- ब्‍लॉग जगत की सकारात्‍मक प्रवृत्तियों को रेखांकित करने के उद्देश्‍य से अभी तक जितने भी प्रयास किये गये हैं, मेरे समझ से उनमें ‘ब्‍लॉगोत्‍सव’ एक अहम प्रयोग है। अपनी मौलिक सोच के द्वारा मैंने इस आयोजन के माध्‍यम से पहली बार ब्‍लॉग जगत के लगभग सभी प्रमुख रचनाकारों को एक मंच पर प्रस्‍तुत किया और गैर ब्‍लॉगर रचनाकारों को भी इससे जोड़कर समाज में एक सकारात्‍मक संदेश देने का प्रयास किया है । जहां तक प्रतिक्रिया का प्रश्न है तो हर नए काम की अच्छी और बुरी दोनों तरह की प्रतिक्रियाएँ होती है । इसके भी हुयी, मगर दाबी जुबान से ही सही बिपरित प्रतिक्रिया देने वालों ने भी यह महसूस अवश्य किया होगा कि एक दिन यह प्रयोग मिल का पत्थर साबित होगा।
प्रश्न - हिन्दी साहित्यक ब्लॉग को लेखर बहुत सारी सकारात्मक चीजे हैं । लेकिन कुछ नकारात्मक बाते भी हैं । कुछ वर्ष पूर्व ब्लॉग ने हिन्दी को एक नयी दिशा दी लेकिन अब समय हैं की हमें हिन्दी को वेब से बाहर भी निकालना चाहिए । कहीं न कहीं हिन्दी साहित्य में पब्लिशिंग अभी भी बहुत धीमी और सीमित दिखती हैं । एसे में अगर हिन्दी साहित्य केवल ब्लॉग तक सीमित रखा जाये तो ये हिन्दी साहित्य के साथ न्याय नहीं होगा  । ब्लॉग शायद एक उत्प्रेरक हैं लेकिन एक फ़ाइनल स्टॉप नहीं हैं । आपकी क्या राय हैं ?
रवीन्द्र प्रभात - मैं आपकी बातों से पूर्णत: सहमत हूँ और ऐसा होना ही चाहिए मैं मानता भी हूँ, किन्तु आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप देने मे वेब का बहुत बड़ा योगदान है । वेब ने इस दिशा मे निश्चित ही एक उत्प्रेरक का कार्य किया है, जो प्रकाशन सौ वर्षों मे नहीं कर सका । हमारे पास अनेकानेक सामाजिक-सांस्कृतिक और बौद्धिक  संपदाएं है जिसे प्रसारित कर विश्व को लाभान्वित किया जा सकता है। विश्व समुदाय से निकटता बनायी जा सकती है। भारतीय संस्कृति के विकास में एक अहम् भूमिका निभा सकती है हिंदी ब्लॉगिंग। हाँ ब्लॉग संचालन का उद्देश्य पवित्र होना चाहिए । रवि रतलामी जी हमेशा कहते हैं कि हिन्दी साहित्य को नया सुर, तुलसी ब्लॉग से ही प्राप्त होगा । हाँ आने वाले समय मे ई-साहित्य इस दिशा मे एक बेहद कारगर अस्त्र साबित हो सकता है, ऐसा मेरा मानना है।
प्रश्न - आज पुस्तकों के भविष्य पर बहस हो रही हैं , ईबुक अथवा प्रिंट बुक । आपने तकनीक और साहित्य को बड़े करीब से देखा हैं आपकी क्या राय हैं ? क्या हम  इस तरह की बहस को कर समय से पहले ही पुस्तकों की विदाई की तैयारी में लगे हुये हैं ।
रवीन्द्र प्रभात -  परिवर्तन प्रकृति का नियम है । परिवर्तन ही पीढ़ियों के बीच टकराव का माध्यम बनता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि आनेवाले समय में सबसे बड़ी चुनौती ई-बुक से आएगी।  लेखक और पाठक के बीच सीधा रिश्ता कायम होगा और प्रकाशक की नखरेवाजी कम होती चली जायेगी।  इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि प्रकाशक समय की नब्ज़ को पहचानें और समयानुकूल साहित्य का प्रकाशन करें।  
प्रश्न - दुबारा आपके लेखन की ओर रुख करते हैं ।  आप को आप की पुस्तकों से क्या अपेक्षाएं है । आलोचना को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं ?
रवीन्द्र प्रभात - देखिये पुस्तक प्रकाशन कभी भी स्वांत: सुखाय के लिए नहीं होता, बल्कि सार्वजनिक वाचन के लिए होता है । हर कृति की समीक्षा इसलिए भी जरूरी है कि यह पाठकों को केवल आकर्षित ही नहीं करती, बल्कि उन्हें पढ़ने को विबश भी करती है । पाठक अपनी पसंद के हिसाब से पुस्तकों का चयन करता है और पुस्तक समीक्षा उनकी मदद करती है। जहां तक साहित्यकारों से अपेक्षाओं का प्रश्न है तो यह हर देश काल में रहा है। यह कोई नयी बात नहीं है ।
हाँ एक बात अवश्य कहना चाहूँगा कि कुछ रचनाकार हमेशा सहज लिखते हैं, कुछ बिल्कुल इसके विपरीत असहज लिखते हैं। कुछ तो खुद की फैंटेसी की लपेट में पाठक को भी लपेटना चाहते हैं। उनके सिर आलोचकों का हाथ होने के कारण उनकी वे रचनाएं चर्चा में आ जाती हैं, उन पर प्रायोजित बहसें करायी जाती है। इसके विपरीत दूसरी ओर कुछ ऐसे रचनाकार भी हैं जिनकी रचनाएं पूर्ण सादगी, सरलता और सहजता से अपने परिवेश की बात करती हैं। मेरी समझ से ऐसे ही साहित्यकारों से समाज को अपेक्षा पालनी चाहिए । बाकी को समाज से नहीं वाद और गुटबाजी से मतलब है 
हमारे माध्यम से आप किसी को धन्यवाद देना चाहेंगे ?
सबसे पहले तो मैं धन्यवाद देना चाहूँगा अपने सुधि पाठकों को जिन्होंने मेरी कृतियों को सराहा । इस माध्यम से मैं धन्यवाद देना चाहूँगा अपने उन सभी प्रतिबद्ध साहित्यिक मित्रों को भी जिनकी आलोचना-समालोचना और परामर्श ने मेरे लेखन को परिष्कृत किया । आपको भी धन्यवाद देना चाहूँगा कि आपने आज मुझे इतना कुरेदा कि वो बातें भी बाहर आई जो भीतर तक दफन थी । शुक्रिया आपका ।
रवीन्द्र जी हमसे बातचीत करने की लिए बहुत बहुत धन्यवाद । 

( उपन्यास ' प्रेम न हाट बिकाय '  फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध हैं खरीदने की लिए क्लिक करे । रवीद्र जी के ब्लॉग परिकल्पना का वेब पता - http://www.parikalpnaa.com/ )

[परिकल्पना ब्लोगोत्सव] हम पूजा करें न करें पर प्यार करते रहें : उषा वर्मा

mailभारत में जन्मीं लेखिका उषा वर्मा जी वर्तमान में ब्रिटेन में रहकर हिन्दी के विकास में अपना योगदान दें रही हैं l संघ बरेली से सम्मानित उषा जी ‘शाने अदब’ भोपाल, ‘निराला सम्मान’ हैदराबाद, तथा कथा यू.के. लंदन से कहानी संग्रह ‘कारावास’ पर पद्मानंद साहित्य सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं। उनकी अबतक की प्रकाशित पुस्तकों में ‘क्षितिज अधूरे’, ‘कोई तो सुनेगा’(कविता संग्रह ) ,‘कारावास’ (कहानी संग्रह) और संपादित पुस्तकों में सांझी कथायात्रा’,एवं ‘प्रवास में पहली कहानी’और अनूदित पुस्तकों में बच्चों की पुस्तक ‘हाउ डू आई पुट इट आन’, का हिन्दी अनुवाद व पचीस उर्दू कहानियों का हिन्दी अनुवाद मुख्य हैं l प्रस्तुत है उषा वर्मा जी की डॉ.प्रीत अरोड़ा से विशेष बातचीत l


(1)    प्रश्न–उषा जी आपने संगीत में उच्च शिक्षा प्राप्त की और फिर दर्शन शास्त्र में एम.ए। तो इसके बाद आपकी रुचि हिन्दी साहित्य में कैसे हुई?

उत्तर–प्रीत जी आपके इस प्रश्न के उत्तर में मुझे अमृता प्रीतम याद आती हैं। दर्शन मेरे लिए सारा आकाश है, व्यापक है विस्तृत है पर उस आकाश के नीचे मुझे रहने के लिए एक घर चाहिए,और यह घर मेरे लिए साहित्य है, जहां मैं क्लांत हो कर विश्राम लेती हूं।इस घर में कई कमरे हैं,संगीत का कमरा अधिकतर बंद ही रहा । जब दर्शन  में एम.ए. किया तो वही मेरे जीवन का पाथेय बना । साहित्य की आत्मा का जो भी विस्तार हुआ उसमें दर्शनशास्त्र का बहुत बड़ा योगदान है । मेरे शिक्षक डा.देवराज, डा.सुरमा दासगुप्ता  थीं   जिनसे मुझे प्रेरणा मिली ।डा.देवराज उन दिनों हिंदी में ख़ूब लिख रहे थे और प्रायः साहित्य और दर्शन में किसे चुने इस अन्तर्द्व्नद की बात भी करते थे।संभवतः मेरे मन पर उसी का प्रभाव पड़ा। साहित्य में विस्तार की संभावनाएं मुझे अपने लिए अधिक रुचिकर लगीं।

(2) प्रश्न- क्या आप के साहित्य पर दर्शनशास्त्र का प्रभाव पड़ा?

उत्तर-जी हां कविता में यह अधिक मुखर हो सका है।मैं समझती हूं कि मनुष्य अपने जीवन संघर्ष में विराट से टकराता है,बार-बार प्रश्न पूछता है,आत्म विश्लेषण करता है, सब कुछ नकार देता है,और नए नैतिक आग्रहों की खोजबीन करता है।मेरी कविताओं में मिथक प्रतिरोध की मुद्रा में ही आए हैं।और यह सब कुछ कहीं बहुत अंदर से आता है। दर्शन, हमें जीवन के तमाम पक्षों को उलट पुलट कर देखने की दृष्टि देता है।और ये पक्ष साहित्य के अंग हैं।  कह सकती हूं कि साहित्य पर दर्शन का काफ़ी प्रभाव पड़ा। इसने मुझे साहित्य को सही अर्थ में समझने  की शक्ति दी, साथ-साथ जीवन की विषमताओं से जूझने की सामर्थ्य दी।दर्शन में तत्व मीसांसा के प्रश्नों ने तरह तरह से घेरा है।मैं तुम्हारा प्रतिबिम्ब हूं।(तुम्हें मूं चिढ़ाता हुआ, इस भूखंड पर खड़ा हुआ और नहीं कुछ बस, तुम्हारा ही आईना हूं।) और यह घेरना मुझे बहुत हूर तक नहीं ले जाता। (क्या तुम अर्धसत्य नहीं हो।)इन सब का सामना ज़मीन की सच्चाइयों में ही ढूंढने का प्रयास किया है।(मरने वाले से तुम्हें क्या मिलेगा,ज़िंदा रहने वाला तुम्हारे नाम को चलाता हैँ)दर्शन की विवेचना ने ही मुझे इन ज़मीनी सच्चाइयों तक पहुंचाया है।

(3) प्रश्न–आप किन साहित्यकारों से अत्याधिक प्रभावित हुई हैं?

उत्तर–प्रीत जी यह तो लम्बी श्रंखला है, यदि आप का आशय भारत के साहित्यकारों से है, तो एक उम्र में टैगोर, शरत ,प्रेमचन्द, यशपाल आदि ने फिर प्रसाद, पंत निराला, महादेवी , अज्ञेय मुक्ति बोध नागार्जुन दिनकर और रेणु आदि को पढ़ा। किन्तु नागार्जुन तथा निराला जी ने अत्यधिक  प्रभावित किया। उसके बाद एक लम्बा अंतराल। यहां आने के बाद नए परिवेष में तालमेल बिठाना सब कुछ समझना। साहित्य कब कहां  छूट गया, कु छ पता ही न चला। वे दिन बेहद संघर्ष के थे, बेपनाह चिंताएं।  संघर्ष तो सब जगह है ही। एक दूसरा दौर शुरू हुआ, बीच के साहित्यकारों को मैने इधर 1990 के बाद पढ़ा, जब हाई कमिश्नर सिंघवी दम्पति ब्रिटेन आए। उससे पहले सभी अपनी अपनी सामर्थ्य भर लिख रहे थे। लेकिन उन्हों ने सब को एक सूत्र में बांधा। भारत के साहित्यकारों में डा. नामवर सिंह ,डा.विश्वनाथ त्रिपाठी, गिरधर राठी, चित्रा मुदगल,.सूर्यबाला, ममता कालिया,रवीन्द्र कालिया डा. गंगाप्रसाद विमल  डा महीप सिंह डा. कैलाश बाजपेई, कमलेश्वर और सीतेश आलोक इन सब का मैं बहुत सम्मान करती हूं,मैने इनका साहित्य पढ़ा मैं इनके साहित्य के अलावा इनके व्यक्तिगत गुणों के लिए भी सम्मान करती हूं। भारत इतना बड़ा है बहुत से साहित्यकार हैं, लेकिन  मैं  थोड़े से  लोगों को जानती हूं।

(4) प्रश्न– क्या विदेश में रह कर अन्य साहित्यकारों से आपका मिलना जुलना होता है?

उत्तर–जी हां,साहित्यकारों से मिलना तो बराबर ही होता रहता है।और मैं उनके प्रोग्राम भी यॉर्क में करती हूं। नेहरू सेंटर में जब कभी कोई साहित्यिक  उत्सव होता है तो जाती रही हूं। किन्तु यॉर्क लंदन से दूर है इसलिए विशेष अवसर पर ही जाती हूं। विराट कवि सम्मेलन में जो साहित्यकार आते हैं वे यॉर्क भी आते हैं ।यॉर्क में हम अपनी संस्था  भारतीय भाषा संगम में साल में तीन या चार छोटी गोष्ठिय़ां भी करते हैं।अतः मिलना जुलना तो होता ही है।

(5) प्रश्न–अब तक आपकी कौन कौन सी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं

उत्तर–लिखा तो बचपन से, पर उसे कहीं छपवाया नहीं। एक तो सुविधा नहीं थी। दूसरी बात कि मैंने कभी यह सोचा ही नहीं कि मैं अपनी लिखी चीज़ों को छपवा सकती हूं। मेरी पहली किताब इंग्लैंड आने पर 1998 में  छपी। इसके पहले कुछ कविताएं हैदराबाद से प्रकाशित हुई थीं।वाणी प्रकाशन दिल्ली से “प्रवास में पहली कहानी” और प्रभात प्रकाशन दिल्ली से “सांझी कथायात्रा”,  विद्या विहार दिल्ली से “कारावास” और बोडली हेड प्रकाशन  लंदन से “ हाउ डू आई पुट इट आन” का हिन्दी अनुवाद तथा दो कविता संग्रह “क्षितिज अधूरे” बुकप्ल्स दिल्ली से, मेघा प्रकाशन दिल्ली से “कोई तो सुनेगा”तीन और किताबें यदि संभव हुआ तो शीघ्र आएंगी।

(6) प्रश्न–आप अपनी रचनाओं में किन विषयों को उठाती हैं, और आपके कविता संग्रह “कोई तो सुनेगा” में किन विषयों को संजोया गया है?

उत्तर–मेरी कविताओं में विश्वजनीन समकालीन विषय ही होते हैं।इन रचनाओं पर दर्शन का प्रभाव स्पष्ट  है।कहीं पहुंचने की तीव्र इच्छा,वह न हो सका तो निराशा,फिर आत्म-विष्लेषण। धार्मिक विषयों पर व्यंग्य, और मिथक मेरी कविताओं में  प्रतिरोध की मुद्रा में आए हैं। इसका दूसरा स्वर प्यार है। प्यार हमारे अहं को तोड़ता है।“कोई तो सुनेगा” पुस्तक का शीर्षक ही यह संकेत देता है कि इसमें एक पुकार है, और यह आकांक्षा भी है कि इस पुकार को  कोई न कोई सुनेगा। इसके दो पक्ष है एक तरफ़ गहरे मानवीय संबंधों की रक्षा के लिए, तो दूसरी तरफ़ संशय से घिरा आर्त मन पूछता है “क्या तुम अर्ध-सत्य नहीं हो”।इसमें प्रश्न हैं प्रतिप्रश्न हैं, बाजारवाद के खिलाफ़ आवाज़ मुखर हुई है,- “कौन छीन ले गया ,हमारी संवादनाओं को, हमारे प्यार को, जो तुम्हारे प्रति समर्पित था”। इतिहास के प्रति एक चेतना है, यद्यपि मैं समझती हूं कि इतिहास निष्पक्ष नहीं होता, न कोई उससे कुछ सीखता ही है।मेरी कविताओं में न कोई शिक्षा है, न कोई नारा, न कोई वाद ही है। कहीं- कहीं अपने को समझने का प्रयास है। आत्म-विवेचना है। मेरे घनीभूत अनुभव के दायरे में जो कुछ भी आया चाहे वह सुख, दुःख या विचित्र उसे मैंने स्वर देने का प्रयास किया है। अपने अंदर के अंदर झांकने की प्रबल इच्छा है।अतः कह सकते हैं कि यही विचार- तत्व लगातार काम कर रहा है।

(7 )प्रश्न– आपने हिन्दी कहानियों का उर्दू अनुवाद भी किया है । उर्दू का ज्ञान आपने कहां से लिया?

उत्तर–उर्दू मैने स्वयं सीखा है । मैने उर्दू कहानियों का हिन्दी में अनुवाद किया है। यदि हो सका तो यह पुस्तक शीघ्र हिंदी लिपि में आएगी ।एक छोटी सी घटना, जब मैने स्कूल में उर्दू पढ़ी तो उस्तानी जी ग़लती करने पर कान मरोड़ देती थीं। मैं रोज़ मन ही मन बिनती करती थी कि उस्तानी जी बीमार पड़ जाएं । छः सात महीने बाद उनकी नौकरी खतम हो गई, तब क्या पता था कि उसी  उर्दू से मुझे इतना प्यार हो जाएगा। बाद में एम,ए. करते समय मैने उर्दू स्वयं पढ़ी ।बहुत मन से उर्दू साहित्य पढ़ा और पढ़ाया भी। मेरी दो संपादित पुस्तकों में ब्रिटेन की महिला उर्दू कथाकारों की कहानियों का अनुवाद उर्दू से हिन्दी में मैने स्वयं किया है।समय निकाल कर मैं अभी भी उर्दू साहित्य पढ़ती रहती हूं । मुझे भाषा सीखने का शौक़ है।बगंला भाषा मेरी मां को आती थी। मैने इसे भी उनकी मदद से घर पर ही सीखा।

(8 )प्रश्न–आप स्वयं को एक सफल कवयित्री मानती हैं या सफल कहानीकार और क्यों?

उत्तर–प्रीत जी यह तो टेढ़ा प्रश्न है। जब आप साहित्यकार की बात करती हैं तो मुझे अत्यंत संकोच होता है।अपने बारे में मुझे कोई मुग़ालता नहीं है। मैं कविता, कहानी, लेख लिखती हूं पर अपने मन की डिमांड पर । बाज़ार साहित्य में बुरी तरह घुस गया है जिस सफलता की हम बात करते हैं उस कसौटी पर तो मैं कहीं भी नहीं हूं। ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में मार्च- अप्रैल 2010 के 209पृष्ट पर ‘कोई तो सुनेगा’ का मूल्यांकन छपा है।और ‘कारावास’ पुस्तक की समीक्षा ‘संचेतना’ के 2009के जून-अगस्त अंक छपी है, ‘संचेतना’ के2010 मार्च –से मई के अंक में एक साक्षात्कार छपा है। मुझे लगा बिना किसी शोर शराबे के भी कोई सुन रहा है।मैं अपने को साहित्य का विद्यार्थी ही मानती हूं।

(9) प्रश्न–आपने पुस्तकों का संपादन भी किया है, आपका संपादन के क्षेत्र में क्या अनुभव रहा है?

उत्तर–संपादन का काम श्रम  साध्य होता है। और इसे योजनाबद्ध तरीके से करना पड़ता है । सबसे पहला काम पत्र लिखना, वर्ड प्रोसेस से लेकर अंत तक सारी रचनाओं को इकट्ठा करना ,काट-छांट करना, पढ़ना, कभी कोई तथ्य ग़लत लगे तो उसे लाइब्रेरी जा कर देखना आदि ज़रूरी और समय की मांग करता है।मैने किताबों का संपादन अपनी छोटी बहन चित्रा  के साथ किया था । और फिर छोटी बहन के साथ तो काम करना एक सुखद अनुभव  रहा ।मुझे टीम में काम करना अच्छा लगता है। किसी भी टीम में काम करने के लिए सब कुछ पहले से तय करना ठीक रहता है। यदि आप अनजान संपादक हैं तो प्रकाशक  का मिलना ही मुश्किल होता है। मैं इस विषय  से बहुत ख़ुश हूं कि मुझे वाणी प्रकाशन तथा प्रभात प्रकाशन का पूरा सहयोग मिला। मैं उनका आभार मानती हूं

(10) प्रश्न–क्या आपने साहित्य के अलावा किसी और क्षेत्र में भी क़दम रखा

उत्तर–स्कूल से वि,वि. तक सभी सांस्कृतिक कार्य़क्रम, नृत्य, संगीत, ड्रामा वाद- विवाद सब में भाग लिया। अन्तर्रविश्वविद्यालय वाद-विवाद प्रतियोगिता में गोल्ड-मेडल मिला । किंतु संगीत और नृत्य में आगे कुछ नहीं किया।उसके लिए सुविधा नहीं थी।

(11 )प्रश्न–आपको कौन से कार्य के लिए निराला सम्मान से नवाजा गया.?

उत्तर–मुझे 2005 में मेरे काव्य संग्रह “क्षितिज अधूरे” पर निराला सम्मान मिला।2009 में कहानी संग्रह “कारावास” पर कथा यू.के का पद्मानंद साहित्य सम्मान मिला।

(12) प्रश्न–आपको अपनी कौन सी रचना सर्वाधिक प्रिय है और क्यों”?

उत्तर–प्रीत जी, मैंने इतना अधिक तो नहीं लिखा है कि चुनाव करूं, जो भी लिखा है वह मन से पूरे सुख-दुखमें डूब कर ,और वह सब प्रिय है। शायद कभी आपसे मिलना हो तो इस पर चर्चा कर सकूं।

(13 )प्रश्न–आजकल विदेश में रह रहे हिन्दी साहित्यकारों  के लिए प्रवासी शब्द का प्रयोग किया जा रहा है, आप इससे कितनी सहमत हैं?

उत्तर–‘प्रवासी’ शब्द हो या ‘शुद्ध हिन्दी’ या ‘नॉस्टेलजिया’ या फिर और बहुत से स्लोगन चर्चा में बने रहने के लिए अच्छे हैं। साथ ही साथ ये प्रयास थोड़ा हवा को साफ़ भी करते हैं। किन्तु मुझे नहीं लगता कि इस से साहित्य सृजन में कोई अंतर आएगा । ‘प्रवासी’ शब्द से अधिक प्रवासी हिन्दी साहित्य के प्रति भारतीय मुख्यधारा के कुछ हिन्दी साहित्यकारों का रवैया इस तरह का रहा कि यहां के साहित्यकारों को यह प्रश्न उठाना पड़ा । इसका कोई समाधान होगा मुझे नहीं लगता। किन्तु विस्थापन का संघर्ष, जिसे बिना जाने समझे आपके कुछ साहित्यकार नास्टाल्जिया, खंडित व्यक्तित्व, और विभाजन की त्रासदी कह कर यहां के लेखन को दर किनार कर देते हैं, इस तरह के विशेषण न हमें उत्साहित करते हैं न सदभावना पैदा करते हैं। संभवतः ये लोग अपने पूर्वाग्रह से आगे सोच नहीं सकते। ऐसे लोग अगर भारत में हैं तो यहां भी हैं।

(14) प्रश्न–विदेश में रह कर आपको साहित्य के क्षेत्र में किन किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

उत्तर–लेखन में चुनौतियां तो हैं ही आप कहीं भी रहें। बाज़ार साहित्य में अपने पूरे ताम- झाम के साथ पसर कर बैठ गया है। बाज़ार ही साहित्य के आदर्श को तय कर रहा है। क्या बिक सकता है? जैसे लोग रातो-रात करोड़पती बनना चाहते है, उसी तरह लेखक भी रातो-रात शिखर पर पहुंच जाना चाहता है।और इसके लिए लेखन के अलावा लेखक को और भी बहुत कुछ करना पड़ता है। यह तो सामाजिक चुनौतियां हैं, पर व्यक्तिगत रूप से मैं राजधानी से दूर हूं।, साहित्यकि गोष्ठियों का अभाव, पुस्तकों का अभाव। लंदन में हाई-कमीशन है जहां किताबें भी हैं, किंतु जिनका वितरण हिंदी अधिकारी को एक सहायक न मिलने के कारण सुचारु रूप से नहीं होता । सांस्कृतिक केंद्र नेहरू सेंटर है जहां भारत से साहित्यकार आते हैं।सबका राजधानी पहुँचना हमेशा संभव नहीं हो पाता न ही वे उन क्षेत्रों में  साहित्यकारों को भेजने को प्रबन्ध करते हैं।

(15 )प्रश्न– आपके घर में कौन सा सदस्य आपके साहित्य-लेखन में साधक या बाधक सिद्ध हुआ?

उत्तर–मैं स्वयं ही बाधक और साधक दोनो ही हूं।मेरा छोटी बहन चित्रा, मेरे पति महेन्द्र तथा दोनों बेटे और बहू तथा परिवार के अन्य सदस्यों ने मुझे मेरी साहित्यिक यात्रा में सदा प्रोत्साहन दिया है। हर तरह से इसे सुविधाजनक बनाया है।मेरा पहला कविता संग्रह छप ही सका क्यों कि महेन्द्र मेरी इधर उधर पड़ी  हुई कविताओं को सम्हाल कर रख देते थे।अपनी पहली पुस्तक ‘क्षितिज अधूरे’ छपी, देख कर इतनी ख़ुशी हुई कि अब मैं स्वयं सब कुछ सम्हाल कर रखती हूं।मैं ही बाधक हूं क्योंकि लिखने के लिए बैठती हूं तो किताबों में मन उलझ जाता है। पढ़ना तो होता है पर उसी तरह लिखना नहीं हो पाता। हर दिन अपने से किया वादा तोड़ती हूं। साधक इस लिए कि जो कुछ भी लिखा गया है वही मेरी साधना है। और अब तो बाधक मेरा स्वास्थ्य है।

(16 )प्रश्न– उषा जी क्या आप जीवन पर्यन्त विदेश में रहना चाहेंगी या आपकी मातृभूमि की ओर भी वापसी होगी।?

उत्तर–प्रीत जी –आपके इस प्रश्न ने मन को कहीं बहुत गहरे छुआ है। मातृ-भूमि की तरफ़ वापसी का प्रश्न अब कहां उठता है। निश्चय ही लौटना नहीं होगा। अकेला-पन हर हालत में है। मेरे और महेन्द्र के भाई बहन भारत में हैं, हमारा परिवार यहां, तो दोनों तरफ़ अकेले-पन का यह सिलसिला जीवन भर बना रहेगा। जितने दिन शरीर साथ दे बार-बार सब से आकर मिल सकूं यही इच्छा है।वापसी  न होने पर भी लौटने की ललक तो साथ जाएगी ही।(17 )प्रश्न–हिन्दी साहित्य के प्रेमियों के लिए कोई संदेश देंगी।

उत्तर–हम सब की पारस्परिक सद्भावना और विश्वास में आस्था निरंतर बनी रहे।हम ‘पूजा करें न करें पर प्यार करते रहें’।






साक्षात्कार प्रस्तुति : ड़ॉ प्रीत अरोड़ा

जन्म – 27 जनवरी. शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनों वर्षों में प्रथम स्थान के साथ और मृदुला गर्ग के कथा-साहित्य में नारी-विमर्श पर शोध-कार्य . कार्यक्षेत्र-. अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद।





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