सियासी मज़हब व मज़हबी सियासत-- जगदीश बाली

कोरोना वायरस आज पूरे विश्व में मनुष्य के विनाश पर तुला है
और संपूर्ण मानव जाति मौत की देहलीज़ पर खड़ी हैं। परंतु हमारे देश के सियासी व मज़हबी हल्कों में तू-तू, मैं-मैं की जुगलबंदी गज़ब चल रही है। इस विकट काल में जहां पूरा शासन, प्रशसन व लोग दावानल की तरह फ़ैलती कोरोना की महामारी के विरुद्ध जुगत लगा रहे हैं, वहीं हमारे देश में तबलीगी ज़मात को ले कर मुबाहिसा व तकरार जारी है। मज़हबी लोग सियासी बातें कर रहे हैं और मज़हब पर सियासत करने वाले भी माहौल को गर्म ही रखना चाह्ते हैं। उन्हें तो जैसे कमान में एक नया तीर मिल गया है, जिसे वे अपने सियासी अंदाज़ में अपने फ़ायदे के लिए मनमाफ़िक चला सकते हैं। चले या न चले, परंतु इन सियासी व मज़हबी शूरों ने अपने मयान व कमान से तीर और तलवार निकाल ज़रूर रखे हैं। देश के इस सियासी मंज़र को देखकर मुझे किसी शायर की ये लाइने याद आ रही हैं, "जिसको अब भी हो सियासत पे यकीन, उसको ये मुल्क दिखाया जाए।" मज़हब वाले सही और गलत, दोजख और पाकीज़ा की बात छोड़कर अपनी तकरीरों व ज़िरह से खुद को खुदा और इंसानियत के सबसे बड़े नुमाइंदे व किरदार साबित करने में लगे हैं। इस बहसी शोरगुल में ऐसा लगता है कि मज़हब भी सियासी हो गया है और सियासत तो मज़हब का इस्तेमाल करती आ ही रही है।
वैसे इस बात को समझने के लिए सामान्य बुद्धि ही काफ़ी है कि कोरोना किसी को भी हो सकता है। वो किसी को ग्रसित करने से पहले उसका परिचय नहीं पूछता, उसकी जात, जमात, बिरादरी, मजहब नहीं पूछता। न ही वह किसी खुदा या ईश्वर के आदेश पर किसी खास लोगों को चुनता है। वह किसी के दर पर दस्तक नहीं देता। उसे तो इंसान चाहिए जिसे वो दबे पांव ग्रस लेता है। परंतु हाल ही में तबलीगी ज़मात के लोगों के कोरोना कॉनैक्शन के विषय में कई बातें समझना बहुत ज़रूरी है। कोरोना हो जाना सामान्य बात हो सकती है, परंतु स्ररकारी आदेशों की अवहेलना करके लोगों को किसी स्थल पर इकट्ठे करना कोरोना जैसी महामारी को दावत देना ही है। अनायास या अनजाने में कोरोना से ग्रसित हो जाना अलग बात है, मगर डॉक्टरों की सलाह न मान कर मस्ज़िद में बने रहने के लिए कहा जाए तो मामला संगीन हो जाता है। कोरोना होने पर जांच या इलाज के लिए आगे आना वांछनीय व सामान्य बात है, मगर कोरोना होने पर छुप जाना और लुका-छुपी खेल कर देश की विभिन्न जगहों पर जाना बिल्कुल अवांछनीय कृत्य है। कोरोना महामारी के समय किसी धर्मगुरु या मौलवी का मरकज़ में जमात के लोगों को ये संदेश देना कि कोरोना से अल्ला बचाएगा और मस्ज़िद मरने की सबसे बेहतरीन जगह है और खुद अदृश्य हो जाना कतई भी सही नहीं ठहराया जा सकता। कोरोना काल खंड में मज़हब का ये स्याह चेहरा देख कर कहा जा सकता है, "हर एक दौर का मज़हब नया खुदा लाया, करें तो हम भी मगर किस खुदा की बात करें।"
ये बात सोलह आने सही है कि कुछ तबलीगी लोगों के गलत कारनामों की वजह से पूरे मुस्लिम धर्म को बदनाम या इंगित नहीं किया जा सकता। मैं भी इंगित नहीं कर रहा हूं। परंतु यह भी उतना ही गलत है कि कुछ लोगों की गलत करतूतों को इसलिए नज़रअंदाज किया जाए क्योंकि वे किसी अमूक ज़मात से संबंध रखते हैं। इस तरह का अंदाज़-ए-नज़र सही नहीं और काबिल-ए-मुज्जमत है।
यदि निज़ामुद्दीन या चांदनी महल की मस्ज़िदों से तबलीगी कोरोना पोज़िटिव निकलेंगे, तो यही कहा जाएगा कि तबलीगी जमात के कुछ या इतने लोग कोरोना पोज़िटिव निकले। अगर किसी मंदिर से हिंदु कोरोना पोज़िटिव निकलेंगे, तो यही कहा जाएगा कि अमूक मंदिर से कुछ पुजारी या हिंदू कोरोना पॊज़िटिव निकले। इसमें किसी धर्म, समुदाय या जमात को निशाना बनाने या बदनाम करने वाली बात कहां से आ जाती है। वास्तव में कोई ज़मात, धर्म या समुदाय तभी बदनाम होता है जब उन समुदायों के महनीय लोग भी अपने समुदाय के कुछ लोगों की काली करतूतों की मुज्जमत करने के बजाय उन करतूतों पर पर्दा डालने या नज़र अंदाज़ करने की कोशिश करते है। कोरोना से जूझ रहे मैडिकल स्टाफ़ के साथ बदसलूकी, यहां-वहां, जहां-तहां थूकना किस धर्म के लोग उचित ठहरा सकते हैं। हो सकता है इन बातों में कुछ फ़साने भी हो, पर सब के सब फ़साने नहीं हैं। फ़साने के बहाने सच्चाई को छुपाया नहीं जा सकता। ऐसे लोगों को बचाने की बजाय जमात को इन्हें कटघरे में खड़ा कर सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग करनी चाहिए। यदि जमात ऐसे लोगों कि खींचाई करने के बजाय सरकार की खामिया निकालने में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाएगी, तो उस जमात का बदनाम होना स्वत: ही तय है।
इसी तरह हाल ही में कुछ निहंग लोगों के द्वारा कोरोना कर्फ़्यू के दौरान पुलिस पर हमले के कारण पूरे निहंग समाज या सिख समुदाय को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। परंतु यदि ये समुदाय हमलावरों की तरफ़दारी या बचाव में खड़े होंगे तो इनका बदनाम होना तय है। संतोष व खुशी की बात है सिख समुदाय के महनीय लोग इस कुकृत्य की सख्त लहज़े में भर्तसना कर रहे हैं और सख्त कार्र्वाई की बात कर रहे हैं। यही धर्म कहता है। सरकार या प्रशासन की कमियां हो सकती हैं, परंतु कोरोना काल में तबलीग के लोगों की गलतियों को नहीं ढांपा जा सकता। लोकतंत्र में नागरिकों का सहयोग व कर्तव्य ऐसी आपदा की घड़ी में और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। मैं सिर्फ़ तबलीगी जमात के लोगों की गैरजिम्मेदाराना रवैये की बात कर रहा हूं। यहां मुस्लिम धर्म या इस्लाम की बात नहीं हो रही है। बहुत से मुस्लिम आलिम जमात की पुरज़ोर मुज्जमत कर रहे हैं। यदि हिंदुओं का कोई समुदाय आसा राम, राम पाल, राम रहीम जैसे धर्म्गुरुओं के पक्ष में खड़ा होगा, तो उस हिंदू समाज या समुदाय का बदनाम होना अवश्यंभावी है। इन सरीखे लोगों की पैरवी में खड़े हो जाना कहां का धर्म है और किस मज़हब की तालीम है। गलत को गलत नहीं कहिएगा, तो फ़िर क्या कहिएगा। ये पब्लिक इतनी भी नादां नहीं कि इतना भी न समझ पाए।

भारत की राजनीती

                         भारत  की राजनीती  की सब से बड़ी त्रासदी  यह है की  यहाँ  जो  भी  राजनातिक दल  केंद्र में या राज्य  में सतासीन  होता है उस की रणनीति  यही  होती है की पार्टी अपने    चाहने वालो  और खासमखासों को अच्छे  पद व  सुखसुविधाये प्रदान करे  और  जिस से सता  छिनी  है  उस पार्टी  के अफ़सरों व  खासमखासों  को  कही एसी  जगह  तेनती  दी जाए  जहा से  वे  लोग  सता  के  गलियारों से दूर  रहे  एक  तरह से  उन को कोई अहम  कम न दे कर  सिर्फ  आराम का मोका दिया  जाये।इसी तरह  जब पुरानी पार्टी फिर  से सतासीन होती है यही क्रम पुन:दोहराया  जाता है। कुछ अफ़सर तो  अपनी ताजपोशी के लिए  अजीबो गरीब हथकन्डे  अपनाने  में  भी गुरेज नहीं  करते तो  कुछ अपनी ऊँची  पहुच व निष्ठा  का या  यूं  कहिए चमचागिरी का राग अलाप कर मनवांछित पद को पते है।इसे सताधारी की  कुशी ,इच्छा ,अपना वर्चस्व दिखाने का अहंकार ,राजनेतिक बदला या सता में बने  रहने की मजबूरियां ......?

                       यहाँ  मेरा ये कहना  है कि  हर  दोनों  राजनेतिक  पार्टी -पक्ष  एवं  विपक्ष के  ये अवसरवादी लोग  केवल अपना  हित  ही देखते है देश ,दुनिया और प्रदेश  हित से इन्हें  कुछ लेना देना  नहीं  होतो। कुछ  चमचों की तो इतनी  हिमाकत बड़  जाती है कि  वो तो न छोटा  देखते है न बड़ा शर्म  लिहाज संस्कार  उन को छूते  तक नहीं। विडम्बना तो ये है की ये राजनेता  भी इन चापलूसों की  सुनते  है  और  इन्ही की मर्जी के आदेश  हो जाते है। राजनेता  ये भूल  जाते है की जो राजसुख वो भोग रहे है वो चमचो के बल पर नहीं आम आदमी के आशिर्वाद के फलस्वरुप  भोग रहे है ।

                      एक और बात जो अहम है  वो  पक्ष -विपक्ष की जो ये खासमखासों की उठा -पटक  है इस का अंजाम होता है दोनों ही पक्षों  को पाँच -पाँच सालों की सुरक्षा  गारेंटी योजना ....! और अधिकांश अफसरों ,कर्मियों तथा कामगारों को शिथिल कर  देना। इस राजनेतिक चक्की में  पिस्ता है वो  जो न इधर का है न उधर का,.. बेनामी  जायेदाद भी यही  दोनों  किसम के लोग  बनाते है चर्चायें तो होती है एक्शन कमेटी भी बनती है जब फ़ैसले का वक्त आता है  फिर सता पलट  जाती है खुडालेन वाले लेन में आ जाते है  लेन वाले खुडालेन में  चले जाते है यही  क्रम चलता आ रहा है और उम्मीद है आगे  भी जारी रहेगा।। कियूँकी    दोनों  पक्ष  जानते है अल्टीमेटली होगा कुछ नहीं। पाँच साल एक भोगे तो फिर पाँच साल दूसरा ...!!, आम आदमी अपनी बनाने के लिए भगवान  क़े दर   जाये ,अल्लाह की दरगाह पर रोये ,ईसा के घर मोमबती जलाये,  गुरु नानक  शरण जाये---- या फिर  भाड़  में जाये !!!!भारत  महान है परमात्मा के नाम से  देश चल ही   रहा है,..और अच्छा चल रहा है .........  

             मेरी मानो तो ये देश इन बीच वालों के सिर  और दम पर चला है। गाँधी , सुभाष  भगत जेसे  महापुरूष अगर  आज होते तो कुछ  करते , या कूच कर  लेते। अबके  महापुरूष तो सिर्फ उपदेश ही करते है  ,दवाइयाँ बेचते है नेता, समाजसेवक व मिडिया संसद में ,टीवी चैनेल पर केवल चर्चा ही करते .....!!!

अमृत कुमार शर्मा 



कानून कार्यवाही का हक देता है अभद्रता का नहीं


कानून कार्यवाही का हक देता है अभद्रता का नहीं

दीपक 'कुल्लुवी' (देहली ब्यूरो चीफ) न्यूज़ प्लस ऑन लाईन चैनल I

डी0 टी0 सी0  बसों की चैकिंग के लिए तैनात टिकेट चैकर जो लगभग  पाँच से सात  की संख्या में होते हैं ,बिना टिकट पकड़ी गई स्वारी से  अक्सर ऐसा अभद्र  व्यबहार करते नज़र आते हैं की देखने वालों को शर्म आ जाए यह ठीक है बिना टिकट पकड़ी गई स्वारी को निश्चित तौर पर सज़ा  मिलनी  चाहिए लेकिन अभद्रता  क्यों ? गन्दी गन्दी गलियां क्यों ? ऐसा करके तो वोह सब भी  गुनाहगार  बन जाते हैं  पाँच ,दस रुपए  की टिकेट के लिए उस व्यक्ति की इज्जत का जनाज़ा  निकल जाता है I 
हाल ही में ऐसा नजारा  मैंने गोविंदपुरी मैट्रो स्टेशन के साथ लगते श्यामनगर  बस स्टैंड पर भी  देखा टिकेट चैकरों की टीम एक असहाय बीस बरस के लड़के को माँ,बहन की गलियां दे रहे थे उनके मोटे ताज़े बाउंसर उसको पकड़कर इधर उधर खींच रहे थे लड़का बार बार कह रहा था मैंने  टिकेट चैकरों को दिया था लेकिन टिकेट चैकर यह कह रहे थे वोह टिकेट किसी दूसरे व्यक्ति नें दिया था लेकिन यह लोग माननें को तैयार ही नहीं थे वह अच्छे घर का पढ़ा लिखा लड़का लग रहा था I उस समय खींची तस्वीरों में आपको  खुद-व-खुद स्थिति का अनुमान हो जाएगा I 
यह चैकर इंसान  को इंसान ही  नहीं समझते  अगर कोई बिना टिकट पकड़ा जाए उससे जुर्माना कबूल करो, न दे तो उचित कार्यवाही करो  उसे  भेड़  बकरियों की तरह इधर उधर न धसीटा  जाए  जैसे कोई सजा याफ्ता मुज़रिम  हो I  उसकी  बात पर भी गौर करना चाहिए कई बार जल्दवाज़ी  में टिकेट कहीं गिर भी सकती है खो सकती है I अब यह टिकेट चैकर बिना टिकट पकड़ी गई स्वारी को इधर उधर धसीट कर क्यों ले जाते हैं यह बतलाने की ज़रुरत ही नहीं आप सब खुद समझदार हैं उनकी मंशा जगजाहिर है I  और मुझे तो नहीं लगता कि बिना टिकट पकड़ी गई स्वारियों से चलान काटकर जितना जुर्माना इकठ्ठा करके वोह सब सरकारी खजानें  में जमा करवाते होंगे  वोह उन सबकी पगार से ज्यादा होता होगा I   
टिकेट चैकरों  को अपनी वाणी  पर नियंत्रण रखना चाहिए I कानून उन्हें उचित कार्यवाही का हक देता है अभद्रता का हरगिज़ नहीं I  क्या ऐसे टिकेट चैकरों  को भी सज़ा नहीं मिलनी चाहिए ?

रोज जलता है, फिर भी जिंदा है। खामोश रहता है, फिर भी चर्चाबिंदु है। कृष्णा बारस्कर, बैतूल





                        कुछ दिन पहले मैं एक नामी गिरामी संगठन के साथ स्वदेशी आंदोलन के अंतर्गत एफडीआई (देश के खुदरा व्यापार में सीधा विदेशी निवेश) के विरोध में पुतला दहन कार्यक्रम में होकर आया हूं। लगभग 100-150 लोग जमा हुए। थोड़ी देर नगर के चौक-चौराहो से गाड़ियो की रैली निकाली अंत में नगर के मुख्य चौराहे पर जमा हुए। वहां सरकार, एफडीआई, महंगाई के विरोध में खूब नारे लगाये गये।

कुछ विदेशी सामानों के ढेर जमा किये गये और उसके बाद एक चार-पहिया वाहन से एक पुतला निकाला गया। उस पुतले के साथ ही बहुत सारे विदेशी खुदरा सामान जैसे कि शैंपू, साबून, बिस्कुट, चॉकलेट, चिप्स, कुरकुरे, पेप्सी, कोक आदि भी जमा किये गये।

पुतले सहित समस्त सामग्री चौक के बीचोंबीच रखी गई, उसे जूतों की माला पहनाई गयी। विदेशी सामान का प्रतीक होने के कारण उसपर खूब गुस्सा निकाला गया! कुछ लोग तो एफडीआई रूपी उस पुतले पर गुस्से से इतने अधिक लाल-पीले थे कि उन्होने दो चार जूते-चप्पल-सेंडिल भी उस पुतले पर धर दिये। कुछ लोगो का मन केडबरी डैरीमिल्क (चॉकलेट) पर ललचाता भी नजर आया।

कुछ देर तक भाषण बाजी हुई, फोटोग्राफी हुई और एक बॉटल से पेट्रोल निकाला गया और पेट्रोल डालकर उसे जला दिया गया। धू-धूकर जलते विदेशी सामान और एफडीआई का रूप धरे पुतले को देखकर लगा कि मानों एफडीआई नाम का जिन्न आज जलकर भष्म हो गया और अब वह अपने देश के आम नागरिको को नहीं डराएगा और न ही कोई विदेशी कंपनी अब देश में मल्टीशॉपिंग स्टोर खोलेगी।

एक पुतला एक गधे तुल्य महानः-
फिर मुझे याद आया कि कुछ दिन पूर्व ही मैं कई अन्य संगठनों के साथ महंगाई, भ्रष्ट्राचार, आतंकवाद, कुशासन आदि-आदि कुरीतियों के पुतले बनाकर जला चुका हूं। मैं सोचता हूं कि एफडीआई, महंगाई, भ्रष्ट्राचार, आतंकवाद, कुशासन तो हमारी निकम्मी सरकार की ही देन है, उसीका किया धरा है फिर उस बेचारे पुतले का क्या कसूर? उसे क्यूं बार-बार जलाकर तकलीफ दी जाती है।

जिन लोगो का प्रतीक बनकर वह लात-जूते खाता है, गुस्सा झेलता है, जल-जलकर इतना दर्द और अपमान बरदास्त करता है? क्या वे बुराईया या लोग पुतले क साथ कभी जले है? या क्या कभी उन बुराईयों का खात्मा हुआ है? जिस विदेशी सामान की हम होली जलाते है, घर वापस पहुंचकर क्या हमने उनका बहिस्कार किया है कभी? सवाल तो बहुत है जवाब मिलते ही कहा है? मिले भी तो कम ही मिलते है। मुझे तो आज के जमाने में पुतलाउसी महान परोपकारी गधेतुल्य नजर आता है।

गधा वह महाप्राणी है, जिससे सामान्यतः किसी भी व्यक्ति चाहे वह निकम्मा हो, कम दिमाग वाला हो, आलसी हो, नालायक हो चाहे मुर्ख हो उसकी तुलना कर दी जाती है। वो बेचारा बिना किसी ना-नुकुर के परस्वार्थ भावना से हमारे मान सम्मान का खयाल करके अपनी बेईज्जती बरदास्त कर लेता है।

जबकी सब जानते है कि आज दुनिया का सबसे मेहनती प्राणी गधा ही है, यकीन नहीं आये तो कोई उसके इतना सामान ढोकर दिखाए! उसके इतना अपमान सहकर दिखाये? फिर भी गधा तो गधा ही है न। चुंकि वह शहनशील है, धैर्यवान है, और समझदार भी है, इसलिए वह सबके बदले की उलाहना खुद सुनकर भी अपना काम करता रहता है।

खयाल एक और महान पुतले काः-
फिर मेरे खयाल में आया कि हमारे देश में एक और महान पुतलाभी तो है। जो देश के पूरे राजनैतिक धरातल का केन्द्र बिन्दु है। जो एक गठबंधन सरकार का प्रतीक बनकर देश की जनता के न जाने कितने ही जूते-चप्पल-सेंडिल खा रहा है। उसे एफडीआई, महंगाई, भ्रष्ट्राचार, आतंकवाद, कुशासन के प्रतिशोध में जनता जूते-चप्पल पहनाकर रोज जलाती रहती है। फिर भी देखो ढीठ! कितनी ही बुराईया, गालिया खाकर भी वो अपने साथियों की ढाल बना हुआ है।

बिल्कुल उसी महान ओरिजनल गधेकी तरह जो सबसे मेहनती होते हुए भी भ्रष्ट्राचारियों, निकम्मों, कम दिमाग वालोे, आलसियो, नालायकों, मुर्खो, बद्दिमाग आदि-आदि लोगो तुलना के अपमान का बोझ सहकर उनकी ढाल बना रहता है। चलो... फिर भी ये गधाउसी महान गधेकी तरह सहनशील है, धैर्यवान है और समझदार होने के कारण अपने सब साथियों के बदले की उलाहना खुद सुनकर भी अपना काम करता रहता है। वैसे इसने किया ही क्या है? बेचारा! सोनिया माता का गधा’! पुतला कही का!

अब आते है हकीकत के धरातल देखेः-
हम जिस स्वदेशी आंदोलन में शामिल हुए थे वहा से हमें जिस फोन के माध्यम से बुलाया गया। वो मोबाईल फोन था नोकिया (फिनलैंड की कंपनी का उत्पाद), दोबारा जिस फोन से रिमाइंड कॉल किया गया वह सेमसंग (जो कोरिया की कंपनी) का था। कमाल की बात यह थी कि उनमें से एक मोबाईल में वोडाफोन (इंग्लैण्ड) की सिम लगी थी। जो मोबाईल फोन हमने पकड़ रखा था वो था चाईनीज फोन जिसका कोई ब्रांड नाम नहीं होता, हां उसमें सिम जरूर रिलायंस (स्वदेशी) की थी।

जिस गाड़ी से मैं रैली में भाग लेने गया वो गाड़ी सुजुकी जियस (जापान) की थी। उसमें डाला गया पेट्रोल विदेश (सऊदी अरब) से खरीदा जाता है। बहुत से लोग जिन गाड़ियों पर सवार थे वे गाड़िया हीरो-होंडा, हांेडा (जापानी), सुजुकी (जापानी), मारूती (जापानी), यामाहा (जापानी) आदि विदेशी थी।

जिस गाड़ी में पुतला लाया गया वह मारूती (जापानी कंपनी) द्वारा निर्मित कार थी। जो लोग उसमें शामिल हुए थे उनमें ज्यादातर के पहने हुए जीन्स, टी-सर्ट और कपड़े विदेशी (अमेरिकी स्टाईल) थे, उनके हाव-भाव, चाल-ढाल, पहनावा, दिखावा सब विदेशी टाईप का! रैली में मुझे तो हर चीज जलाने लायक ही लगी।

बस,,,, एक ही वस्तु दिखी जो सुद्ध स्वदेशी थी और जलाने लायक भी नहीं लगी, वह थीः- देशी चिंदियो से बना पुतला’! हमारे  .....मो...... सिं..... का।

(आखो देखा सत्य! लेकिन व्यंग)

हरियाणा के शहर फरीदाबाद का किया नाम रौशन रिपोर्ट: दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'


DSC03279.JPG
हरियाणा के शहर फरीदाबाद का किया नाम रौशन

रिपोर्ट: दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'

"इंडिया तुझे सलाम " देश भक्ति गीत लिखने के लिए हरियाणा के खूबसूरत शहर फरीदाबाद के श्री हरभजन जी को मिला देश के दिग्गजों से सम्मान स्पीकर दिल्ली बिधान सभा श्री योगानन्द शास्त्री जी ,दूरदर्शन के महानिदेशक श्री एस० एस० खान जी ,राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सुभाष सक्सेना जी ,महासचिव प्रभारी कांग्रेस श्री जगदीश टाईटलर जी व् देश के अन्य बड़े अधिकारीयों नें किया श्री हरभजन जी का सम्मान उनके लिखे गीतों को संगीत दिया मशहूर संगीतकार राजू सक्सेना जी ने गाया श्री जी० एस० परदेसी जी ने और कैमरा पर कमॉल दिखाया हिमाचल के श्री एस० के० गौतम जी नें I
इस एल्बम में देश के सैनिकों खिलाडियों व महान वीरों और देश के आवाम को ध्यान में रखते हुए ऐसे गीत लिखे हैं जो दिल की गहराइयों को देश के प्रति मजबूत करते है तथा आपसी भाईचारे का सन्देश देते हैं और हमारे खून में देश भक्ति का जज्वा जागते हैं
हरभजन के लिखे गीत आप जल्द ही हिंदी फिल्मो. में भी सुन सकेंगे I

भष्‍टाचार

भष्‍टाचार किसी भी देश के लिए अभिशाप है । इसे समाप्‍ता होना ही चाहिए। सत्‍यता ईमानदारी कर्तव्‍यपरायणता बहुत ही जरूरी है। ऐसी व्‍यवस्‍था तभी सम्‍भव है जब सभी को हर सुख सुविधायें मिले भेदभाव समाप्‍त हो सब को काम मिले तभी भष्‍टाचार से लड़ना सम्‍भव है। पैसे का अभाव ही भष्‍ट तंत्र को जन्‍म देता है। शुरूआत हो गई नये सवेरा आने की बस इन्‍तजार है की सुबह कब होगी ।


पूजनीय गुरु डॉ. श्री विश्वमित्र जी महाराज को अंतिम बिदाई और कुल्लू मनाली से उनका बिशेष प्रेम I




हरिद्वार में श्री राम शरणम प्रमुख व हमारे परम पूजनीय गुरु डॉ. श्री विश्वमित्र जी महाराज हमें इस भरी दुनियाँ में अकेले छोड़कर श्री राम की शरण में परमधाम को चले गए I
कुल्लू मनाली से महाराज जी को बिशेष प्रेम था वहीँ पर उन्होंने बरसों घोर तपस्या की थी I महाराज जी की कुल्लू घाटी को सबसे बड़ी देन यह है की जहाँ छोटे छोटे बच्चे नवयुवक लड़ाई झगड़ा, ड्रग्स, नशे की लत्त के शिकार हो रहे थे वह बुरी आदतें छोड़ कर श्री राम शरणम् से जुड़ गए और आप आज देखिये मनाली स्थित श्री राम शरणम् में जब भी अमृतवाणी होती है तो सभी हाल तो खचाखच भर ही जाते है लेकिन सड़क तक भर जाती है यह उनका कमाल नहीं तो क्या है जगह जगह लोग आपको जाप करते नज़र आ जाएँगे धीरे धीरे समस्त घाटी में श्री राम शरणम् का निरंतर विस्तार होता जा रहा है कुल्लू में महाराज जी से दीक्षित 'कुमुद' शर्मा की पहल पर उनकी छोटी बहन लवली रमणीक होटल के नजदीक हर सप्ताह अमृतवाणी करती है जिसमें बहुत सारे लोग जुड़ने शुरू हो गए हैं I श्री जयदेव 'विद्रोही' जी की छोटी पुत्रवधू 'कुमुद खुद जब शमशी कुल्लू जाती है तो अपने घर में स्थित नैना माता मंदिर में अमृतवाणी करती है और अपने मायके नांगाबाग़ में भी ज़रूर करती है I देहली में तो हर बीरवार अमृतवाणी करती ही है I

हरिद्वार में तीन जून 2012 दुपहर लगभग तीन बजे श्री राम शरणम् से महाराज की अंतिम यात्रा निकली और अपने सर्वप्रिय भक्ति स्थल नीलधारा में शाम 6 .30 के करीब लाखों भक्तों की मौजूदगी में उनके मृत शरीर को मोटर बोट में रखकर गंगा के बीचों बीच ले जाकर जल प्रवाह कर दिया गया I नीलधारा में ही उन्होंने सुबह अपना प्राण त्याग किया था जल प्रवाह से पहले भजन व् अमृतवाणी हुई चारों तरफ लाखों राम भक्त ही नज़र आ रहे थे जो देश विदेश से भिन्न भिन्न स्थानों से आये थे हजारों गाड़ियाँ खड़ी थी सबने महाराज जी को दुखी मन से अश्रुपूर्ण बिदाई दी I
मुझे ग़ज़लों,शायरी की दुनियाँ से भजनों की दुनियाँ में लाने वाले गुरु जी ही थे 1995 को मैंने गुरु जी से चंडीगढ़ में दीक्षा ली थी जब मैं रोपड़ में नौकरी करता था उनकी प्रेरणा से ही उसी दिन मैंने अपनें जीवन का पहला भजन लिखा था 'राम श्री राम श्री राम भजो,हरी सुमिरम सुबह शाम करो'......उसके बाद भजनों का सिलसिला ऐसा चला की आज तक कायम है हजारों भजन लिख चुका मेरी धर्मपत्नी 'कुमुद' भी गुरु जी से ही दीक्षित है और मेरे भजन और अमृतबाणी गाती है I अभी कुछ दिन पहले ही वह गुरु जी से मनाली स्थित श्री राम शरणम आश्रम में मिलकर आयी लेकिन मेरी बदनसीबी रही की गुरु जी के अंतिम दर्शन नहीं कर पाया गुरु जी ने देह त्याग भी अपने प्रिय भक्ति स्थल हरिद्वार में ही किया I

गुरु चरणन में शीश झुकाऊँ
द्वार गुरु चाहे आ न पाऊँ .....
गुरु जी का जन्म-१५ मार्च सन् १९४० में हुआ था परम पूजनीय श्री प्रेम जी महाराज के अन्तरंग शिष्य डॉ. श्री विश्वमित्र जी महाराज ने आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसिज, नई दिल्ली में 22 वर्षों तक गौरव शाली सेवा की. आप एशिया के अकेले ओक्यूलर माइक्रोबायोलोजिस्ट के रूप में विख्यात हुए, प्रभु प्रेम का आकर्षण आपको संसार से बाँध नहीं पाया I
आपकी वाणी में विलक्षण तेज, ओज एवं सत्य का प्रभाव था I आपके प्रवचन एवं भजन कीर्तन-गायन से सभी श्रोतागण मुग्ध हों जाते थे I आपके तप का प्रभाव आपके तेजोमय मुख-मंडल से स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता था

आप अपने आवागमन एवं भोजन का पूरा व्यय स्वयं वहन किया करते थे तथा किसी से कोई भेंट स्वीकार नहीं करते थे I
आपने राम नाम को जीवन का एक मात्र उद्देश्य बनाते हुए पूज्य श्री स्वामीजी महाराज द्वारा स्थापित आदर्श परम्पराओं का दृढ़ता पूर्वक निर्वहन करते हुए अपने तेजोमय प्रभा मंडल से समूचे भारत एवं विश्व को प्रकाशित करते रहे हैं I आप दर्शन मात्र से ही सबको आनंदित एवं प्रफुल्लित कर देते थे I

ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व के धनी हैं हमारे गुरु जी हमें इस भरी दुनियाँ में अकेले छोड़कर श्री राम की शरण में परमधाम को चले गए I

इस लेख में कुछ अंश मैंने श्री राम शरणम् की वैब साईट से लिए हैं I

राम राम.....राम राम....राम राम....
दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'

धारा के विपरीत --- संस्‍मरण

वह वर्ष 2003 का संभवत: अगस्‍त या सितंबर महीने के कोई शनिवार का दिन था ।  लखनऊ का दिल कहा जाने वाला हजरतगंज चौक से मैं मिनी बस से गोमती नगर को घर के लिए जा रहा था ।  मिनी बस खचाखचा भरी हुई थी।  बस में जो थोडी सी सीटें थी, वे सब क्षमता से भी अधिक भरी हुई थी ।  अधिकतर सवारियां खड़ी थीं ।  चलती,  रूकती बस हजरतगंज से गोमती नगर के हुसैडिया चौराह तक पहुंचते - पहुंचते आधा घंटे से अधिक का समय ले लेती है ।  हां तो,  बस में अधिकतर सवारियां खड़ी थी ।  वैसे तो कहीं भी कोई किसी की बातों पर ध्‍यान नहीं देता है ।  बस हो या ट्रेन,  हर कोई अपने काम से  काम रखता है।  विशेषकर लोकल ट्रेन, बस अथवा कम दूरी की सवारियां । लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हें जो दुनिया जहान को भुला कर अपने में ही व्‍यस्‍त और मस्‍त रहते हैं बस में सभी सवारियां खामोश बैठी हुई थी ।  परन्‍तु लोगों का ध्‍यान उस ओर खिंच गया था जहां दो युवक  खड़े - खडे आपस में बातें कर रह थे । दोनों ऊंचे कद काठी के, सुदर्शन और युवा थे । उन का पहरावा भी अच्‍छा था,  यानी वे दोनों आधुनिक वेशभूषा में थे ।  उन की आपस में बातें पहले तो धीरे -धीरे लेकिन फिर उन की वार्तालाप जैसे -जैसे आगे बढ़ रही थी, उन की बातों की आवाज बढ़ती हुई सभी को सुनाई देने लगी थी । सब लोग खामोशी से उन की बातों को ध्‍यान से सुनने लगे थे और एक दूसरे की आंखों ही आंखों में देखने लगे थे ।  दोनों युवक आपसी बातचीत में इतने तल्‍लीन थे जैसे बस में दोनों के अतिरिक्‍त कोई न हो ।  लेकिन लोगों की उत्‍सुकता और जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी ।  क्‍योंकि वे दोनों जिस भाषा में बातें कर रहे थे,  स्‍वाभाविक है सभी को जिज्ञासा होनी ही थी ! और,  जिज्ञासा हो ही रही थी ।   दरअसल,  वे दोनों एक ऐसी भाषा में बातें कर रहे थे जो आजकल प्राय: कहीं सुनाई नहीं देती है  ।  प्रचलन से लगभग लुप्‍त हो चुकी है ।  लेकिन आम भारतीय को जिस पर गर्व है ।  जिसे लोग देश की पहचानदेश की संस्‍कृति, देश की धरोहर कहते हैं । पर व्‍यवहार में कोई उस भषा का प्रयोग नहीं करता है ।  अर्थात , वे दोनों युवक संस्‍कृत में बातें कर रहे थे ।  इसीलिए सभी उत्‍सुकता और जिज्ञासा से उन दोनों की बातें सुन रहे थे । इसी जिज्ञासावश मैं अपने को रोक नहीं सका और पूछ ही लिया,  क्‍या आप दोनों संस्‍कृत के अध्‍यापक या प्राध्‍यापक हैंकिसी कालेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं ? क्‍योंकि दोनों की अवस्‍था 25 -26 वर्ष की लग रही थी ।  कपडे भी अच्‍छे और सलीके से पहने हुए थे । मेरे पूछने पर दोनों ने लगभग एक साथ जवाब दिया,  नहीं हम पढ़ाते नहीं । अध्‍यापक  या प्राध्‍यापक भी नहीं हैं । हम तो केवल विद्यार्थी हैं । संस्‍कृत भाषा के स्‍टुडेंट । ये लखनऊ विश्‍वविद्यालय से पी एच डी कर रहे हैं ।  और,  मैं हिमाचल यूनिवर्सिटी शिमला से संस्‍कृत पर शोध कर रहा हूं । विश्‍वविद्यालयों द्वारा स्‍टुडेंटस में आपसी संपर्क स्‍थापित करने के प्रयोजन से मैं शिमला से यहां आया हूं ।  अभी इन के घर गोमती नगर जा रहे हैं।  उन्‍होंने एक ही सांस में अपना परिचय दे दिया था।  बस में बैठे सभी लोग जैसे गर्व से भर उठे थे । और मै सोच रहा था कि आज लोग अपनी भाषा को छोड़ कर केवल अंग्रेजी में अपना पांडित्‍य प्रदर्शित करते हैं ।  अपने को विद्वान समझते हैं  । ऐसे में इन जैसे युवा पीढ़ी यदि अपनी भाषा अथवा भारत की थाती संस्‍कृत भाषा को प्रयोग करे तो हमें भाषा के लिए विदेशियों की नजरों में नहीं गिरना पडेगा । बस भागी जा रही थी ।  वे दोनों युवक आपसी बातचीत में दोबारा  व्‍यस्‍त हो गए थे ।  लेकिन लोगों को सोचने के लिए एक विषय दे दिया था । अपने भीतर के स्‍वयं को लोग देखने का प्रयास करेंगे ही,  बेशक थोड़े समय, थोड़े दिनों के लिए ही सही ।                                                                                                                                                                                                                        
                                o शेर सिंह                                                                                                         के. के.- 100 ,
                   कविनगर, गाजियाबाद -201 001
                                          E–Mail: shersingh52@gmail.com

Popular Posts

Followers